वैश्विक आर्थिक बदलावों पर विमर्श के लिए आईईओएफ फोरम का शुभारंभ
नई दिल्ली, 29 सितंबर (हि.स.)। विकासशील देशों के लिए अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (आरआईएस) और दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने संयुक्त रूप से इंडिया एंड इमर्जिंग इकोनॉमिक ऑर्डर फोरम (आईईओएफ) का शुभारंभ किया। फोरम का उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो रहे व्यापक बदलावों पर निरंतर बौद्धिक एवं नीतिगत विमर्श के लिए मंच उपलब्ध कराना है।
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव एवं भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास ने फोरम का औपचारिक शुभारंभ किया। उन्होंने ‘ग्लोबल साउथ: नई भू-आर्थिक व्यवस्था को आकार देने में भारत की भूमिका’ विषय पर उद्घाटन संबोधन दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की।
शक्तिकांत दास ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय गहरे भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक बदलावों के दौर से गुजर रही है। वैश्विक आर्थिक गतिविधियों के केंद्र का पूर्व की ओर स्थानांतरण और ग्लोबल साउथ की बढ़ती आर्थिक एवं भू-राजनीतिक भूमिका इन बदलावों के प्रमुख पहलू हैं। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों से विकासशील देशों के सामने नए अवसर पैदा हो रहे हैं और उनका लाभ उठाने के लिए नए विचारों एवं रणनीतियों की आवश्यकता है।आईईओएफ इस दिशा में उच्च गुणवत्ता वाले शोध और सार्थक संवाद का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में उभरती बाजार एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का कुल आर्थिक उत्पादन करीब 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 48.8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया। ग्लोबल साउथ वर्तमान में विश्व की करीब 85 प्रतिशत आबादी और वैश्विक आर्थिक उत्पादन के लगभग 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है। वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत, वस्तु निर्यात में 46 प्रतिशत और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह में 57 प्रतिशत है।
दास ने कहा कि इसके बावजूद ग्लोबल साउथ के विकास की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। गरीबी, ऋण जोखिम, बुनियादी ढांचे की कमी, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा असुरक्षा, प्रौद्योगिकी तक असमान पहुंच और संरक्षणवादी नीतियां बड़ी चुनौतियां हैं। उन्होंने खाद्य सुरक्षा, व्यापार विविधीकरण, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भागीदारी, ऊर्जा संक्रमण, समष्टि आर्थिक स्थिरता और रोजगार सृजन को प्रमुख प्राथमिकता बताया।
भारत के संदर्भ में उन्होंने समष्टि आर्थिक एवं वित्तीय स्थिरता, संरचनात्मक सुधार, बुनियादी ढांचे, औद्योगिक विकास और वैश्विक एकीकरण पर जोर दिया। उन्होंने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और अपतटीय अन्वेषण सहित विभिन्न क्षेत्रों में भारत की पहलों का उल्लेख किया।
उन्होंने ग्लोबल साउथ में भारत की विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण, रियायती वित्तपोषण और पारस्परिक सहयोग को भी रेखांकित किया। उनके अनुसार विकासशील देशों के बीच सहयोग बढ़ने से व्यापार, जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, आपूर्ति शृंखला और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार जैसे मुद्दों पर सामूहिक आवाज मजबूत हो सकती है।
आईईओएफ के भावी एजेंडे के तहत आपूर्ति शृंखला एवं नवाचार, नीति एवं कार्यक्रम मूल्यांकन, जलवायु वित्त एवं आर्थिक सुदृढ़ता, शहरीकरण एवं अवसंरचना वित्त, स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण तथा वित्तीय समावेशन को प्राथमिक क्षेत्रों में शामिल किया गया है। दास ने भारत के आधार, यूपीआई और डिजीलॉकर, केन्या के एम-पेसा तथा ब्राजील के सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों जैसे सफल प्रयोगों से आपसी सीख को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
इससे पहले आरआईएस के महानिदेशक प्रो. सचिन कुमार शर्मा ने स्वागत वक्तव्य दिया। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक प्रो. राम सिंह, गवर्निंग काउंसिल के सदस्य डॉ. शेषाद्रि चारी और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने भी संबोधित किया।
फोरम के शुभारंभ के बाद ‘वैश्विक आर्थिक सहयोग का बदलता परिदृश्य’ विषय पर पैनल चर्चा हुई। इसकी अध्यक्षता भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रो. धनंजय सिंह ने की। चर्चा में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स की प्राचार्य प्रो. सिमरित कौर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन प्रो. अमिताभ मट्टू, बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय निदेशक अशोक के. भट्टाचार्य और आरआईएस के प्रोफेसर डॉ. प्रबीर डे ने भाग लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी