(लीड) गिरफ्तारी या मौत का खतरा भी नहीं रोक सकता, दिसंबर में बांग्लादेश लौटूंगी : शेख हसीना
नई दिल्ली, 05 अगस्त (हि.स.)। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो वर्षों के अंतराल के बाद बुधवार को पहली बार सार्वजनिक रूप से वर्चुअल माध्यम से देश और दुनिया को संबोधित करते हुए ऐलान किया कि वह हर हाल में बांग्लादेश लौटेंगी, चाहे उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए या उनकी जान को खतरा ही क्यों न हो।
शेख हसीना ने यहां फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया (एफसीसीएसए) में आयोजित वर्चुअल ऑडियो माध्यम से संवाद में लगभग 25 मिनट तक अपना संबोधन दिया। सुरक्षा कारणों से उनका कैमरा बंद रखा गया। इसके बाद उन्होंने पत्रकारों के सवालों के भी जवाब दिए।
उन्होंने कहा कि उनकी वापसी सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश को लोकतंत्र, विकास और धर्मनिरपेक्षता के मार्ग पर वापस लाने के लिए होगी। उन्होंने संकेत दिया कि वह दिसंबर में अपने देश लौटना चाहती हैं, हालांकि अंतिम तिथि की घोषणा बाद में करेंगी। साथ ही उन्होंने मौजूदा अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस को “अवैध” करार देते हुए उन पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने, अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने तथा देश को अराजकता की ओर धकेलने का आरोप लगाया।
अपने संबोधन में शेख हसीना ने कहा, “मुझे पता है कि वे मुझे जेल में डाल सकते हैं या मार भी सकते हैं, फिर भी मैं बांग्लादेश वापस जाऊंगी। लोगों का समर्थन मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है। मौत की सजा, झूठे मुकदमे और दिखावटी सुनवाई मुझे डरा नहीं सकती। मेरे खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई गैरकानूनी, असंवैधानिक और राजनीतिक मकसद से प्रेरित है।”
उन्होंने कहा कि वह पहले भी कई बार राजनीतिक उत्पीड़न का सामना कर चुकी हैं, लेकिन हर बार अपने देश लौटी हैं और इस बार भी लौटेंगी। भय उनके कर्तव्य का निर्धारण नहीं कर सकता और बांग्लादेश लोकतंत्र का हकदार है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से बांग्लादेश नहीं छोड़ा था। अगस्त 2024 में जब प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे थे, तब उनके पास वहां से निकलने के लिए केवल 30 से 40 मिनट का समय था। उन्होंने कहा, “मुझे उस समय यह भी नहीं पता था कि मैं देश छोड़ रही हूं। मैं तो अपने पैतृक गांव तुंगीपाड़ा जाने की तैयारी कर रही थी, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि मुझे देश छोड़ना पड़ा।”
शेख हसीना ने कहा कि पिछले दो वर्षों से वह अपने प्रिय बांग्लादेश को लगातार पीड़ा में देख रही हैं। उनके अनुसार आज का बांग्लादेश वह नहीं है, जिसके लिए 1971 के मुक्ति संग्राम में लाखों लोगों ने बलिदान दिया था। उन्होंने कहा कि देश में भय का वातावरण है और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो रही हैं।
उन्होंने जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन को लेकर कहा कि यह कोई स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन नहीं था। उनके अनुसार उनकी सरकार ने शुरुआत से ही संवाद, कानूनी प्रक्रिया और धैर्य के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास किया था। घटनाओं की जांच के लिए न्यायिक आयोग का भी गठन किया गया था, लेकिन सुधार की मांग की आड़ में कुछ संगठित समूहों ने छात्र आंदोलन को हिंसक राजनीतिक अभियान में बदल दिया।
शेख हसीना ने कहा कि वर्तमान अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने स्वयं स्वीकार किया था कि यह आंदोलन अत्यंत सुनियोजित था और इसके पीछे एक “मास्टरमाइंड” था। यूनुस के अपने बयान ही यह साबित करते हैं कि यह आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ था, बल्कि पर्दे के पीछे से संचालित किया गया था ताकि लोकतांत्रिक चुनाव के बजाय दूसरे रास्ते से सत्ता हासिल की जा सके।
उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान 450 से अधिक पुलिस थानों को आग के हवाले कर दिया गया, सरकारी इमारतों पर हमले हुए, कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई और कुछ को जिंदा जला दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे हालात में कानून-व्यवस्था बनाए रखना सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं थी क्या।
पूर्व प्रधानमंत्री ने मौजूदा शासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं की लगातार हत्या की जा रही है, उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है, गायब किया जा रहा है और झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि अब तक कम से कम 10 हजार लोग मारे गए हैं या लापता हैं तथा 10 लाख से अधिक लोगों को अज्ञात आरोपी बनाकर मुकदमों में शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न बढ़ गया है और बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के प्रतीकों को नष्ट किया जा रहा है। राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की विरासत को मिटाने का संगठित प्रयास किया जा रहा है।
शेख हसीना ने आर्थिक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान शासन में औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई है, निवेश प्रभावित हुआ है और देश की आर्थिक प्रगति रुक गई है। बांग्लादेश को फिर से लोकतांत्रिक व्यवस्था, आर्थिक विकास और सामाजिक सौहार्द के मार्ग पर लाने की आवश्यकता है।
भारत के साथ संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत हमेशा बांग्लादेश का सच्चा मित्र रहा है। साल 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर आज तक जब भी बांग्लादेश कठिन दौर से गुजरा है, भारत उसके साथ खड़ा रहा है। सरकारों के संबंध अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों देशों के लोगों के बीच मित्रता कायम रहनी चाहिए।
प्रेस वार्ता में मौजूद उनके पुत्र सजीब वाजेद ने भी बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने भारतीय मीडिया से अपील की कि वह बांग्लादेश की परिस्थितियों को प्रमुखता से उठाए। एक स्थिर और लोकतांत्रिक बांग्लादेश केवल वहां के नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और भारत की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।
सजीब वाजेद ने आरोप लगाया कि अगस्त 2024 से हजारों लोग जेलों में बंद हैं और उनमें से अधिकांश को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया है। उन्होंने दावा किया कि पुलिस हिरासत में मौतों का सिलसिला जारी है और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन में हुई मौतों के आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने 1,400 लोगों की मौत का उल्लेख किया है जबकि बांग्लादेश सरकार केवल 800 मौतों की बात कर रही है। उन्होंने पूछा कि शेष 600 लोग कौन हैं और सरकार इस अंतर का जवाब क्यों नहीं दे रही है।
इस अवसर पर बांग्लादेश के पूर्व शिक्षा मंत्री मोहिबुल हसन चौधरी ने कहा कि पिछले दो वर्षों में देश बुरी तरह विभाजित हो गया है। महिलाओं, अल्पसंख्यकों और पत्रकारों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है तथा न्याय की जगह प्रतिशोध की राजनीति हावी हो गई है।
बांग्लादेशी लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक अबू ओबैदा आरिन ने दावा किया कि शेख हसीना किसी जनादेश के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक साजिश के चलते निर्वासन में हैं। हसीना बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि देश में सामान्य लोकतांत्रिक वातावरण बहाल करने के उद्देश्य से वापस लौटना चाहती हैं।
उल्लेखनीय है कि शेख हसीना अगस्त 2024 से भारत में रह रही हैं। छात्र आंदोलन के बाद उनकी सरकार गिर गई थी और उन्हें ढाका छोड़ना पड़ा था। पिछले वर्ष नवंबर में बांग्लादेश के एक विशेष न्यायाधिकरण ने 2024 के आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई से जुड़े मानवता के विरुद्ध अपराध के मामले में उन्हें अनुपस्थिति में मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद से बांग्लादेश सरकार लगातार भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग करती रही है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर