(अपडेट) फर्जी सीएसआर दान मामले में ईडी ने चार राज्यों में आठ ठिकानों पर ली तलाशी
नई दिल्ली, 30 सितंबर (हि.स.)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने डॉ. धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह एवं अन्य से जुड़े कथित फर्जी कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) दान मामले में बुधवार को महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर के आठ ठिकानों पर तलाशी ली। इनमें महाराष्ट्र के पांच और अन्य तीन स्थानों पर एक-एक परिसर शामिल है। तलाशी में बाजार संचालकों, ट्रस्टियों और बिचौलियों के परिसरों को शामिल किया गया। जांच में सैकड़ों करोड़ रुपये के कथित फर्जी सीएसआर रैकेट का पता चला है।
ईडी ने बताया कि एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत यह जांच 12 जुलाई को जुहू पुलिस थाने, ग्रेटर मुंबई सिटी में दर्ज प्राथमिकी संख्या 1044/2026 के आधार पर शुरू की है। प्राथमिकी में धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के खिलाफ महाराष्ट्र मेडिकल प्रैक्टिशनर्स अधिनियम, 1961, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत मामले दर्ज हैं। इनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 471 और 475 के अनुरूप अपराध भी शामिल हैं, जो धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत अनुसूचित अपराध हैं।
जांच के अनुसार, सिंह के पास कोई मान्यता प्राप्त चिकित्सकीय योग्यता या चिकित्सा परिषद में पंजीकरण नहीं था और उन्होंने केवल 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बावजूद उन्होंने कथित तौर पर खुद को चिकित्सक बताया और करीब तीन दशक तक ‘डॉक्टर’ की उपाधि का इस्तेमाल किया। जांच में आरोप है कि इसी पहचान और ‘डॉक्टर’ की उपाधि से जुड़े भरोसे का लाभ उठाकर उन्होंने कई धर्मार्थ ट्रस्ट और संस्थाएं स्थापित कीं और संचालित कीं। इन संस्थाओं के जरिए स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी सीएसआर गतिविधियों के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में सीएसआर राशि जुटाई गई।
जांच में ट्रस्ट, ट्रस्टी, बिचौलियों, कमीशन एजेंटों और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं का एक नेटवर्क सामने आया है। प्रथम दृष्टया आशंका है कि इस नेटवर्क का इस्तेमाल सीएसआर राशि को व्यवस्थित तरीके से दूसरी जगह भेजने के लिए किया गया।
जांच के अनुसार, कुछ ट्रस्टों को मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से सीएसआर राशि प्राप्त करने के लिए बनाया या इस्तेमाल किया गया। इन उपक्रमों के समक्ष वैध सीएसआर परियोजनाओं के नाम पर प्रस्ताव रखे गए। हालांकि, कथित तौर पर परियोजनाओं को मिली राशि के अनुपात में या तो आंशिक रूप से पूरा किया गया या उन्हें पूरा नहीं किया गया। उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के बिल कथित तौर पर बढ़ाकर बनाए गए और अतिरिक्त राशि को फर्जी या दिखावटी संस्थाओं के जरिए दूसरी जगह भेजा गया। सीएसआर राशि दिलाने और लेनदेन कराने वाले बिचौलियों और दलालों को कथित तौर पर कमीशन भी दिया गया।
जांच में निजी संस्थाओं से प्राप्त सीएसआर राशि को नकद के रूप में वापस किए जाने का एक अन्य तरीका भी सामने आया है। इसके तहत कथित तौर पर योगदान देने वाली निजी संस्थाओं को सीएसआर राशि का बड़ा हिस्सा नकद वापस कर दिया जाता था और ट्रस्ट अपने पास मामूली कमीशन रखते थे। इस तरह सीएसआर व्यवस्था का कथित तौर पर हिसाब-किताब में दर्ज राशि को बिना हिसाब वाली नकदी में बदलने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया।
ईडी के अनुसार, इस तंत्र के जरिए करीब 200 करोड़ रुपये की सीएसआर राशि का लेनदेन होने का अनुमान है। जांच में सामने आए तथ्यों से बड़े पैमाने पर सीएसआर राशि के कथित तौर पर दूसरी जगह भेजे जाने और फिर से इस्तेमाल किए जाने की व्यवस्था का संकेत मिलता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर