जमात-ए-इस्लामी हिंद ने सरकार से सार्वजनिक मुद्दों पर टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने की मांग की

 


- जमात नेतृत्व ने मस्जिदों को गिराने, एसआईआर में अनियमितताओं और असहमति को दबाने पर चिंता जताई

नई दिल्ली, 03 अक्टूबर (हि.स.)। जमात-ए-इस्लामी हिंद ने सरकार से अपील की है कि वह जनहित के मुद्दों पर टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाए। संगठन ने इबादतगाहों को निरंतर निशाना बनाए जाने, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर गंभीर चिंता जताई है।जमात मुख्यालय में आयोजित मीडिया कांफ्रेंस को संबंधित करते हुए जमात-ए-इस्लामी के उपाध्यक्ष प्रो. सलीम इंजीनियर ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के तरीके पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लाखों मूल मतदाताओं सहित लगभग 13 करोड़ नामों को हटाए जाने की खबर ने व्यापक चिंता पैदा कर दी है। मतदाता सूची लोकतंत्र का आधार है। बड़े पैमाने पर इसमें बदलाव के लिए असाधारण पारदर्शिता, सावधानी और सुधार के लिए सुलभ व्यवस्था आवश्यक है। चुनाव से जुड़े फैसलों, भारत के चुनाव आयोग की आज़ादी और उसके संवैधानिक कामकाज, और वोट देने के अधिकार पर असर डालने वाले मामलों में न्यायपालिका के रवैये को लेकर उठे सवालों ने जनता के भरोसे को और कमज़ोर कर दिया है। लोकतांत्रिक संस्थाओं में घटता भरोसा कानून-व्यवस्था और देश की स्थिरता के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है। जमात-ए-इस्लामी हिंद ने मुख्य चुनाव आयुक्त से अपील की है कि वह वोटर लिस्ट की प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर चिंताओं के लिए नैतिक जिम्मेदारी लें और अगर आयोग जनता का भरोसा बनाए रखने में नाकाम रहता है, तो स्वेच्छा से पद छोड़ दें। एसआईआर प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए, पुनरीक्षण से प्रभावित पात्र मतदाताओं की पहचान की जानी चाहिए और उनके नाम बहाल किए जाने चाहिए। प्रो. सलीम इंजीनियर ने शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध को हतोत्साहित करने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं और पुलिस प्रतिबंधों के बढ़ते उपयोग का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अनुमति न देना और उन्हें हिरासत में लेना, लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए उपलब्ध जगह पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नागरिकों के लिए सरकार के फैसलों और संस्थागत कार्यों पर सवाल उठाने का एक वैध लोकतांत्रिक माध्यम है। हम सरकार और पुलिस अधिकारियों से शांतिपूर्ण सार्वजनिक अभिव्यक्ति के लिए पूर्व अनुमति को अनावश्यक बनाने का आग्रह करते हैं। सार्वजनिक सुरक्षा के लिए पूर्व सूचना और उचित व्यवस्था आम तौर पर पर्याप्त होती है। हम गैर-जरूरी हिरासत और बेबुनियाद एफआईआर को खारिज करने, पुलिस के दुर्व्यवहार के आरोपों की निष्पक्ष जांच करने और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग करते हैं। सरकार को टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता चुनना चाहिए, नागरिकों और संगठनों से सीधे जुड़ना चाहिए, और लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत और संस्थागत संवाद के जरिए जायज शिकायतों का समाधान करना चाहिए।जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के दूसरे उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने मस्जिदों, चर्चों और इबादतगाहों को निरंतर निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई और कहा कि इन तोड़-फोड़ की घटनाओं से धार्मिक अल्पसंख्यकों में बड़े पैमाने पर नाराजगी, बेचैनी और निराशा पैदा हो रही है। इबादतगाहों का गहरा धार्मिक और भावनात्मक महत्व होता है। उनके खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए निष्पक्षता, संवेदनशीलता और कानून का सख्ती से पालन ज़रूरी है। मुसलमानों और ईसाइयों के धार्मिक स्थलों के खिलाफ़ कानून का लक्षित इस्तेमाल प्रशासन की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा है। धार्मिक स्थलों से जुड़े बार-बार होने वाले विवाद सामाजिक तनाव पैदा कर रहे हैं और लोगों का ध्यान ज़रूरी आर्थिक और सामाजिक मुद्दों से हटा रहे हैं। अगर इस तरह निशाना बनाना जारी रहा तो विरोध प्रदर्शन फैल सकते हैं और एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार/मोहम्मद ओवैस

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हिन्दुस्थान समाचार / मोहम्मद शहजाद