आईजीएनसीए को दो परियोजनाओं के लिए कुल 546 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली : डॉ. सच्चिदानंद जोशी

 


नई दिल्ली, 23 जून (हि.स.)। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने मंगलवार को कहा कि केंद्र सरकार की ओर से आईजीएनसीए की दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए कुल 546 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली है।

डॉ जोशी ने दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में पूर्वोत्तर भारत की अद्भुत पारम्परिक शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करने वाली एक दुर्लभ प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कही।

उन्होंने कहा, अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 'ज्ञान भारतम योजना' को 491 करोड़ रुपये और 'बृहत्तर भारत' परियोजना को 55 करोड़ रुपये की आधिकारिक स्वीकृति मिल गई है।

इस अवसर पर डॉ जोशी ने पारंपरिक भोजन बनाने वाले बर्तनों के फिर से बढ़ते चलन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज न केवल सोच-समझकर खाना बनाते थे बल्कि बर्तनों का चयन भी इस तरह करते थे कि शरीर को मिट्टी, लोहे, कांसे और जस्ते जैसे आवश्यक तत्व मिल सकें। आज इसी वजह से एलीट क्लास के लोग महंगे दामों पर लोहे की कढ़ाई या लकड़ी के बर्तनों की तरफ वापस लौट रहे हैं।

पीतल, स्टेनलेस स्टील, हिंडालियम और एल्युमिनियम के बदलते दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने इस प्रदर्शनी को युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने वाला और सोचने पर मजबूर करने वाला एक सराहनीय कदम बताया।

समाज सेवी पद्म श्री तेची गुबीन ने कहा कि पूर्वोत्तर के लोगों को उनकी शक्ल से आंकना बंद करना होगा। अगर हमें उनकी पहचान समझनी है तो हमें उनकी समृद्ध संस्कृति, उनके खूबसूरत पारंपरिक पहनावे और उनके त्योहारों को समझना होगा। हमारा राज्य और हमारा देश बेहद रंगीन और विविध है।

प्रदर्शनी का शीर्षक “लिविंग हेरिटेज इन मेटल, बैम्बू एंड क्ले: ट्रेडिशनल अटेंसिल्स ऑफ नॉर्थ-ईस्ट” है। यह आयोजन शोधार्थियों, कलाकारों, डिजाइनरों, संस्कृति-चिंतकों और कला-प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र है। इस दौरान दो मोनोग्राफ का भी लोकार्पण किया गया और पूर्वोत्तर कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति भी दी।

इस प्रदर्शनी को राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन(एनएमसीएम) द्वारा उत्तर-पूर्वी हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम लिमिटेड (एनईएचएचडीसी) के सहयोग से आयोजित की गई। यह प्रदर्शनी 2 जुलाई 2026 तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

आज के औद्योगिक और मशीन-प्रधान युग में यह प्रदर्शनी पूर्वोत्तर अंचल की उन जीवित परम्पराओं को रेखांकित करती है, जो धातु, बांस और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से सदियों से लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। इन पारम्परिक बर्तनों में केवल उपयोगिता ही नहीं, बल्कि समूचे समाज की स्मृतियां, जीवन-पद्धति, प्रकृति-बोध और सांस्कृतिक पहचान समाहित है।

इस खास मौके पर भारतीय पारम्परिक कलाओं और शिल्प पर गहन शोध एवं प्रलेखन को बढ़ावा देने वाले दो महत्त्वपूर्ण मोनोग्राफ : “बेल-मेटल क्राफ्ट ऑफ असम” तथा “चितेरी ऑर्ट ऑफ बुंदेलखंड” का भी लोकार्पण किया जाएगा।

इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, पद्मश्री एवं प्रख्यात समाजसेवी टेकी गुबिन, केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव लिली पांडेय, आईजीएनसीए के डीन एवं एनएमसीएम के प्रभारी प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ तथा एनएमसीएम के निदेशक डॉ. मयंक शेखर सहित अन्य गणमान्य जन मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी