पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भारत को भारत बनाने की जीवन दृष्टि दी : दत्तात्रेय होसबाले

 






- एकात्म मानवदर्शन केवल भारत नहीं, समस्त मानवता के लिए मार्गदर्शकः सरकार्यवाह दत्तात्रेयजयपुर, 25 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत को भारत बनाने की जीवन दृष्टि दी और इसे केवल भारत के लिए नहीं बल्कि विश्व के लिए मार्गदर्शन एवं मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन केवल भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं अथवा भारत के लोगों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए है।

होसबाले शुक्रवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति की ओर से जयपुर के धानक्या में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि मुझे धानक्या की पवित्र भूमि पर आने का अवसर मिला और यहां स्थित दीनदयाल उपाध्याय जी के प्रेरणादायी स्मारक के दर्शन कर उनके जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि यह स्मारक आने वाले लोगों को राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करने की प्रेरणा देने वाला है।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय एक विलक्षण व्यक्तित्व और प्रेरणादायी पुरुष थे। उनके स्मरण में समारोह समिति कई वर्षों से सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन करती आ रही है। उन्होंने समिति के कार्यों के लिए पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के प्रति साधुवाद व्यक्त किया।

एकात्म मानवदर्शन की चर्चा करते हुए होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति और भारत के जीवन दर्शन के विभिन्न विषयों को सार रूप में लेकर आधुनिक युग में जीवन जीने के लिए आधारभूमि तैयार की और इसे एकात्म मानवदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने उपनिषदों के सार को गीता के रूप में मानवता के सामने रखा, उसी प्रकार दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति के सार को एकात्म मानवदर्शन के रूप में इस युग के लिए प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि विश्व को केवल पूंजीवाद और साम्यवाद के दो विकल्पों में नहीं बांटा जा सकता। उनके अनुसार एक ओर स्वतंत्रता पर अत्यधिक आग्रह से असमानता और शोषण की प्रवृत्ति बढ़ी, वहीं दूसरी ओर समानता के आग्रह में स्वतंत्रता समाप्त हो गई। उन्होंने कहा कि दोनों व्यवस्थाओं में बंधुता और मनुष्य के परस्पर संबंधों के विषय की उपेक्षा हुई। भारतीय चिंतन व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेश्वर के संबंधों को आधार मानकर समाज जीवन की व्यवस्था को देखता है।

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि भारत को अमेरिका, इंग्लैंड या जापान नहीं बनाना है, बल्कि भारत को भारत बनाना चाहिए। भारत के व्यक्तित्व, संस्कृति और जीवन मूल्यों के आधार पर खड़ा किया गया जीवन दर्शन केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि विश्व के लिए मार्गदर्शन और मॉडल बन सकता है।

उन्होंने कहा कि इस विचार को केवल पुस्तकों और शोध तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा, इसे कृति में लाना होगा। विद्वान अध्ययन और शोध करें, पुस्तकें लिखें, लेकिन सामाजिक जीवन में इन विचारों के प्रयोग भी होने चाहिए। समाज को देखकर दुनिया को इस विचार की सफलता पर भरोसा होना चाहिए।

ग्रामीण विकास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि गांव में पढ़ाई, कमाई और दवाई उपलब्ध हो तो लोग शहरों की ओर पलायन नहीं करेंगे और गांव गांव बने रहेंगे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के प्रयोग आवश्यक हैं।

उन्होंने नानाजी देशमुख के चित्रकूट और गोंडा क्षेत्र में किए गए ग्राम विकास के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि एकात्म मानवदर्शन के प्रयोग सामाजिक जीवन में किए जाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाएं और नीतियां आवश्यक हैं, लेकिन केवल सरकारी तंत्र से यह कार्य पूरा नहीं हो सकता। समाज को जागृत होकर सामूहिक प्रयास करना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के अनुभव और विवेक को आधार बनाकर आगे बढ़ना होगा।

तकनीक के संदर्भ में होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय तकनीक के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका आग्रह था कि तंत्रज्ञान मनुष्य के जीवन में सुख देने वाला हो, पर्यावरण के अनुकूल हो, आर्थिक रूप से कमजोर न करे, रोजगार समाप्त न करे और जीवन मूल्यों का ह्रास न करे। उन्होंने कहा कि तकनीक मनुष्य को गुलाम बनाने वाली नहीं, बल्कि मानव के सुख के लिए काम करने वाली होनी चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने स्वदेशी को युगानुकूल बनाने की बात कही। विदेश से आने वाले ज्ञान को स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए, लेकिन उसे स्वदेशानुकूल बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित तकनीक के विभिन्न रूपों पर चर्चा हो रही है, ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि तकनीक मानव के लिए उपयोगी कैसे बने।

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय स्वयंसेवक, प्रचारक, राजनेता, विद्वान, अर्थशास्त्री, साहित्यकार और लेखक थे। सामाजिक समरसता, पर्यावरण, परिवार, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों को उन्होंने अपने जीवन में भी उतारा। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के नागरिक कर्तव्य से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने यात्रा के दौरान रेडियो का लाइसेंस समाप्त होने के बाद उसका उपयोग नहीं किया।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का स्मरण केवल उनकी जयंती पर अभिवादन तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके विचारों पर मंथन के साथ उनके जीवन से कुछ सीखकर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने भारत के परम वैभव के लिए अपने जीवन का कण-कण समर्पित कर दिया। हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर इस लक्ष्य के लिए अपने जीवन को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता उद्यमी मनीष गुप्ता ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के अध्यक्ष ओपी अग्रवाल मौजूद रहे। समारोह समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहनलाल छीपा ने समिति की गतिविधियों एवं उद्देश्य के संबंध में जानकारी दी। समिति के सचिव प्रताप भानु शेखावत ने समिति की भावी योजनाओं की जानकारी दी।

समारोह में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों एवं कृतित्व पर शोध के लिए विभिन्न शोधार्थियों और विद्वानों को सम्मानित किया गया। इनमें रांची विश्वविद्यालय के शोधार्थी डॉ. सोहन सिंह, हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. जगदीश सिंह चंदेल, मथुरा के डॉ. अंशुमान कौशिक तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. नागेश चौबे शामिल रहे।

कार्यक्रम में लोक कला एवं संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए आलोकवादक पद्मश्री तगाराम भील तथा भपंग वादक पद्मश्री गफरुद्दीन मेवाती का भी सम्मान किया गया। कार्यक्रम में आभार समिति के उपाध्यक्ष नीरज कुमावत और कार्यक्रम का संचालन गजेंद्र ज्ञानपुरिया ने किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / ईश्वर