(त्वरित टिप्पणी): जंतर-मंतर : आंदोलन का अंत या कानून की हार? सवाल अब भी बाकी है!

 


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

संवाद लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु यदि हिंसा पर भी समझौता होने लगे तो सबसे बड़ा सवाल संविधान और कानून के शासन पर खड़ा होता है। वस्तुत: लोकतंत्र की असली ताकत इस बात से मापी जाती है कि वहां कानून कितना सर्वोपरि है। जनता को अपनी बात कहने का अधिकार है, सरकार पर जनता की बात सुनने का दायित्व है और दोनों के बीच संवाद लोकतंत्र की परस्पर की धुरी एवं स्व चेतना है, किंतु यदि किसी आंदोलन का अंत इस तरह हो कि उसके साथ कानून का सम्मान भी समझौते की मेज पर रख दिया जाए, तब सवाल उठना स्वभाविक है।

कॉकरोच जनता पार्टी(सीजेपी) ने अपना आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी। आंदोलनकारियों ने कहा कि उनकी प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली गई हैं। अच्छा है, लोकतंत्र में बातचीत से समाधान निकलना स्वागतयोग्य है। यदि किसी बड़ी प्रशासनिक विफलता पर राजनीतिक जवाबदेही तय होती है और पीड़ितों को राहत मिलती है, तो निश्चित ही यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया और सफलता है। पर जब इन मांगों में आन्दोलनकारी अनुचित मांग सरकार से करें और सरकार उन्हें स्वीकार कर ले, तब अवश्य चिंता पैदा होने लगती है।

सभी को पता है कुछ दिन पहले दिल्ली में क्या हुआ था, सबके बीच प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, पुलिस पर हमला हुआ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, ऐसे में सवाल यह है कि क्या ऐसे मामलों में भी कानून का पहिया रुक जाना चाहिए?

भारत का संविधान नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(ब) के तहत शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है, किंतु इसी के साथ यही संविधान यह भी स्वीकार करता है कि सार्वजनिक व्यवस्था, कानून और राज्य की सुरक्षा बनाए रखना सरकार का दायित्व है। अर्थात विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा का अधिकार नहीं है। यही कारण है कि देश की सर्वोच्च अदालत भी अनेक अवसरों पर स्पष्ट कर चुकी है कि विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या कानून-व्यवस्था को चुनौती देना किसी भी प्रकार से वैध नहीं माना जा सकता।

दिल्ली पुलिस पहले ही दावा कर चुकी है कि जंतर-मंतर पर लगाए गए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (एफआरएस) की सहायता से 2500 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की जा चुकी है, जिनका पूर्व से आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। अभी तक 15 एफआईआर दर्ज हुईं हैं। ये ठीक है कि इन दावों की सत्यता और उनसे जुड़े आरोपों का अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा, किंतु यदि पुलिस ने विधिसम्मत जांच शुरू की है, तो क्या उसका विधिवत निष्कर्ष भी न्यायिक प्रक्रिया से ही नहीं निकलना चाहिए? क्या इस तरह से अपराधियों को राजनीतिक समझौते के तहत छोड़ा जाना उचित है?

वस्तुत: अब तक का अनुभव यही रहा है कि आंदोलनों के दौरान हुई हिंसा को लेकर सरकारें और न्यायालय दोनों समय-समय पर कठोर रुख अपनाते रहे हैं। वर्ष 2007-09 के दौरान सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 'इन रे: डिस्ट्रक्शन ऑफ पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टीज़ बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश' (2009) मामला, प्रकरण में स्पष्ट किया था कि हिंसक प्रदर्शनों के दौरान संपत्ति की क्षति की जवाबदेही तय करने के लिए प्रभावी तंत्र होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी माना कि सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान अंततः जनता के धन का नुकसान है और इसकी भरपाई के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान और दायित्व तय होना चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों में भी अनेक राज्यों ने दंगों और हिंसक प्रदर्शनों के बाद सार्वजनिक संपत्ति की क्षति की वसूली के लिए विशेष व्यवस्थाएं लागू कीं। उत्तर प्रदेश का योगी मॉडल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, वहां हिंसक घटनाओं के बाद आरोपित व्यक्तियों से क्षतिपूर्ति की कार्रवाई व्यापक चर्चा का विषय बनती ही रहती है। मध्य प्रदेश, हरियाणा और अन्य राज्यों में भी ऐसे मामलों में संपत्ति से क्षति की भरपाई की जाती है। अब भले ही इन कदमों का समर्थन हो या विरोध, लेकिन एक सिद्धांत लगभग हर सरकार ने स्वीकार किया कि हिंसा करने वाला व्यक्ति सिर्फ इसलिए कानून से ऊपर नहीं हो सकता क्योंकि वह किसी आंदोलन का हिस्सा था।

यही कारण है कि आज यदि किसी भी आंदोलन के संदर्भ में यह धारणा बनती है कि हिंसा या तोड़फोड़ से जुड़े मामलों को भी राजनीतिक समझौते के तहत समाप्त किया जा सकता है, तो यह स्वाभाविक रूप से गंभीर संवैधानिक बहस का विषय बनता है। क्योंकि आज जो छूट एक समूह को मिलेगी, कल वही मांग दूसरा समूह भी करेगा। तब कानून का समान अनुप्रयोग कैसे सुनिश्चित होगा?

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पुलिस का आरोप अंतिम सत्य नहीं होता। किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने का अधिकार न्यायपालिका के पास है। यदि किसी निर्दोष प्रदर्शनकारी के विरुद्ध केवल आंदोलन में शामिल होने के कारण मामला दर्ज हुआ है, तो उसे राहत मिलनी चाहिए। परन्तु यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा, आगजनी, पुलिस पर हमला या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के ठोस आरोप हैं, तो उनकी जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना ही कानून के शासन की कसौटी है।

ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम से सरकार के सामने भी एक बड़ी जिम्मेदारी खड़ी होती है। संवाद करना उसका कर्तव्य है, लेकिन कानून लागू करना भी उसका ही दायित्व है। यदि सरकार पीड़ितों को मुआवजा देती है, प्रशासनिक जवाबदेही तय करती है, तो यह स्वागतयोग्य कदम हैं। किंतु यदि हिंसा से जुड़े मामलों पर कोई निर्णय लिया जाता है, तो वह पारदर्शी, विधिसम्मत और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। इससे यह संदेश जाएगा कि सरकार राजनीतिक समाधान और आपराधिक न्याय प्रक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखती है।

आंदोलनकारी संगठनों को भी यह समझना होगा कि किसी भी जनांदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक शक्ति है। शांतिपूर्ण आंदोलन समाज का समर्थन प्राप्त करते हैं, जबकि हिंसक घटनाएं आंदोलन की नैतिक वैधता को कमजोर कर देती हैं। यदि आंदोलन के भीतर असामाजिक तत्व घुस आते हैं, तो उनकी पहचान कर उन्हें कानून के हवाले करना स्वयं आंदोलन के हित में होता है।

अंततः प्रश्न किसी एक आंदोलन का नहीं है। प्रश्न यह है कि भारत को आखिर हम क्या बना देना चाहते हैं? वास्तविकता में सही ओर सफल लोकतंत्र तो वही है, जहां बातचीत हो, सरकार जवाबदेह हो, विरोध का अधिकार सुरक्षित रहे, पर अपराधी भी सजा पाएं। अत: आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है, यदि पहले सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से क्षतिपूर्ति कराई जाती रही है, यदि अनेक मामलों में हिंसक प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई है, तो किसी भी नए मामले में मानदंड अलग क्यों हों?

वस्तुत: किसी भी शासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून की सबसे बड़ी शक्ति उसकी समानता है। यदि उसका अनुप्रयोग परिस्थितियों, दबाव या राजनीतिक समझौतों के अनुसार बदलने लगे, तो यह स्थिति कानून के शासन पर प्रश्नचिह्न लगाएगी। साथ ही लोकतंत्र में जनता के विश्वास को भी कमजोर करेगी । अच्छा हो कि केंद्र की मोदी सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करे और जो प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने के उत्तरदायी एवं अपराधी हैं, उन्हें नियमानुसार विधि सम्मत सजा अवश्य दिलवाए ।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी