‘लक्ष्य बताइए, तरीका मत थोपिए’: युवाओं को लेकर संघ प्रमुख का संदेश
नई दिल्ली, 06 सितंबर (हि.स.)। ब्रिटेन में कार्यक्रम में संवाद करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को युवा पीढ़ी को लेकर भरोसा जताया और कहा कि उन्हें युवाओं पर अधिक विश्वास है, क्योंकि उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा है। उन्होंने कहा कि युवाओं को लक्ष्य दिया जाना चाहिए, लेकिन तरीका उन पर नहीं थोपा जाना चाहिए।
सरसंघचालक मोहन भागवत ने लंदन में ‘सेलिब्रेटिंग ऑननेस’ कार्यक्रम को संबोधित किया, जिसमें 326 संगठनों के करीब 600 प्रतिनिधि शामिल हुए। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी यदि किसी बात को सही मानती है तो उसे पूरा करने के लिए आगे बढ़ती है और परिणामों की ज्यादा चिंता नहीं करती। इसलिए पुरानी पीढ़ी को अपने अनुभव से जरूरी जानकारी साझा करनी चाहिए, लेकिन युवाओं को अपनी राह और तरीके खोजने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि इस तरह युवा सार्वभौमिक नैतिकता और समृद्धि के लक्ष्य को पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक तेजी से हासिल कर सकते हैं।
मोहन भागवत ने हिंदू की अवधारणा को किसी एक पूजा पद्धति या धर्म तक सीमित करने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि हिंदू केवल धर्म या पूजा पद्धति का नाम नहीं है। भारत की परंपरा में नास्तिक से लेकर बहुदेववादी तक विभिन्न विचारों को स्थान मिला है और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता रही है।
उन्होंने कहा कि हिंदू विचार की विशेषता विविधता को स्वीकार करना है। अलग-अलग रास्ते होने के बावजूद अंतिम सत्य और अस्तित्व की एकता को स्वीकार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसी को दूसरे को अपने मत में परिवर्तित करने की आवश्यकता नहीं है।
भागवत ने कहा कि जन्मभूमि और पुण्यभूमि व्यक्ति को मूल्य और संस्कार देती हैं, जबकि कर्मभूमि वह स्थान है जहां व्यक्ति रहता और काम करता है। इसलिए ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को भारत से मिले मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में रहते हुए समाज और देश की सेवा में लगाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटेन के प्रति निष्ठावान रहते हुए अतिरिक्त समय और संसाधनों से भारत की सेवा करना विरोधाभास नहीं है।
संघ के कामकाज को लेकर भागवत ने कहा कि स्वयंसेवक समाज के लगभग हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने कहा 7कि राजनीतिक कारणों से संघ का विरोध करने वाले लोग भी कई मौकों पर स्वयंसेवकों के काम और उनके गुणों को स्वीकार करते हैं तथा महत्वपूर्ण विषयों पर संघ का सहयोग और संवाद चाहते हैं।
भागवत ने संघ की विचारधारा का मूल बताते हुए कहा कि यदि एक सिद्धांत को संघ की पहचान माना जाए तो वह ‘अपनापन’ है। उन्होंने इसे सभी के प्रति शुद्ध और सात्विक प्रेम बताया। उन्होंने कहा कि हिंदू परिवार, समुदाय, समाज और पूरी मानवता से जुड़ाव महसूस करता है तथा केवल पूजा ही नहीं करता, बल्कि प्रकृति से भी प्रेम करता है।
मोहन भागवत ने कहा, मैंने कुछ लोगों को यह कहते सुना है कि हमारे काम का आधार गहन नफरत है। यह इसके बिल्कुल विपरीत है। हमारे काम का आधार 'शुद्ध सात्विक प्रेम' है। अगर मुझे एक ऐसे सिद्धांत का उल्लेख करना हो, जो संघ को परिभाषित करता है, तो वह 'अपनापन' है, सभी के प्रति शुद्ध सात्विक प्रेम। यही हिंदू का पारंपरिक स्वभाव है। एक हिंदू परिवार, समुदाय, समाज और मानवता से जुड़ा होता है। हिंदू केवल पूजा नहीं करता, बल्कि प्रकृति से भी प्रेम करता है।”
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हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा