भाषा विचारों की अभिव्यक्ति है, लिपि उनका ठहराव हैः डॉ. जोशी
नई दिल्ली, 02 जून (हि.स.)। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसी) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानन्द जोशी ने मंगलवार को कहा कि भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है और लिपि उन विचारों को स्थायित्व प्रदान करने वाली व्यवस्था है।
डॉ. जोशी ने आईजीएनसीए में 'ब्राह्मी लिपि' पर तीन दिवसीय आयोजित ग्रीष्मकालीन कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि कार्यशाला से लोगों को भारतीय संस्कृति, इतिहास और प्राचीन लिपियों को समझने का अवसर मिलेगा।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज (आईआईएच) नोएडा के 'डिपार्टमेंट ऑफ पैलियोग्राफी, एपिग्राफी एंड न्यूमिस्मैटिक्स' और आईजीएनसीए के कलाकोश प्रभाग के संयुक्त तत्वावधान में इस शैक्षणिक कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है। यह कार्यक्रम 2-4 जून तक चलेगा। इसमें देशभर से छात्रों और अन्य लोग शामिल हुए हैं।
उन्होंने कहा, “ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों में ज्ञानार्जन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करती हैं तथा उन्हें भारतीय बौद्धिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं के अध्ययन के लिए प्रेरित करती हैं।”
डॉ. जोशी ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल ब्राह्मी लिपि का परिचय कराना नहीं, अपितु युवाओं में भारतीय लिपि-परम्परा के प्रति संवेदनशीलता, जिज्ञासा एवं बौद्धिक रुचि का विकास करना है। यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति, विरासत तथा ज्ञान-परम्परा को समझने की एक महत्वपूर्ण आधारशिला है। प्राचीन अभिलेखों, शिलालेखों एवं पाण्डुलिपियों के अध्ययन के माध्यम से ब्राह्मी लिपि हमें अतीत से साक्षात्कार कराती है तथा हमारी सांस्कृतिक निरन्तरता को समझने का अवसर प्रदान करती है।
उन्होंने उल्लेख किया कि आईजीएनसीए भारतीय ज्ञान-परम्परा के विविध आयामों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्यरत है तथा सिंधु-सरस्वती सभ्यता की लिपि के अध्ययन एवं उसके संभावित पठन के क्षेत्र में भी गंभीर अनुसंधान को प्रोत्साहित कर रहा है।
कलाकोश विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीर लाल ने कहा कि भारतीय परम्परा में इसका सम्बन्ध ‘ब्रह्मा’ से जोड़ा जाता है, जिन्हें सृष्टि के रचयिता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इस दृष्टि से ब्राह्मी लिपि केवल लेखन का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान के सृजन, संरक्षण एवं संवहन का एक महत्वपूर्ण माध्यम रही है।
उन्होंने कहा कि ब्राह्मी भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीनतम एवं सर्वाधिक प्रभावशाली लिपियों में से एक है, जिसने कालान्तर में अनेक क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय लिपियों को जन्म दिया। इसके सतत विकास के परिणामस्वरूप शारदा, देवनागरी, गुरुमुखी तथा अन्य अनेक भारतीय लिपियों का उद्भव हुआ, जो आज भी भारतीय भाषाओं एवं सांस्कृतिक परम्पराओं की वाहक हैं।
आईआईएच की प्रोफेसर डॉ. अनूपा पांडे ने कहा कि इस कार्यशाला को आयोजित करने का मुख्य उद्देश्य युवा और अन्य लोगों को इस क्षेत्र की तरफ आकर्षित करना और उन्हें लिपि सिखाना है। सरकार भी चाहती है कि हम अपनी संस्कृति पर काम करें लेकिन इस क्षेत्र में योग्य लोगों की भारी कमी है। राजनीति में लड़ाई-झगड़े और मतभेद हो सकते हैं लेकिन संस्कृति हमेशा जोड़ने का काम करती है। यह एक 'पुल' की तरह है।
ब्राह्मी लिपि भारत की सबसे प्राचीन लिपियों में से एक है, जिससे आधुनिक युग की कई भारतीय लिपियों का विकास हुआ है। इस तीन दिवसीय समर स्कूल का मुख्य उद्देश्य शोधकर्ताओं, छात्रों और इतिहास प्रेमियों को इस प्राचीन लिपि की बारीकियों, इसके ऐतिहासिक महत्व और इसके शिलालेखों को पढ़ने की तकनीकों से अवगत कराना है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी