आशुतोष मुखर्जी के भाषण आज भी राष्ट्रभावना से ऊर्जावान बनाते हैं : जेपी नड्डा
नई दिल्ली, 30 जून (हि.स.)। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि डॉ. आशुतोष मुखर्जी के भाषण आज भी हमारे मस्तिष्क को संवैधानिक मूल्यों, तर्कपूर्ण विमर्श और गहन राष्ट्रभावना से पुनः ऊर्जावान बनाते हैं। यह विचार मंगलवार को उन्होंने दिल्ली विधानसभा परिसर में आयोजित समारोह में व्यक्त किए। उन्होंने डॉ. आशुतोष मुखर्जी (1864–1924) की 162वीं जयंती के अवसर पर दिल्ली विधानसभा द्वारा प्रकाशित पुस्तक द कलेक्टेड स्पीचेस ऑफ बंगाल टाइगर आशुतोष मुखर्जी का लोकार्पण किया। डॉ. आशुतोष मुखर्जी प्रख्यात शिक्षाविद्, विधिवेत्ता, वर्ष 1904 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य, कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं मुख्य न्यायाधीश तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति थे।
इस अवसर पर आयोजित विशेष समारोह में केंद्रीय राज्य मंत्री (कॉरपोरेट कार्य तथा सड़क परिवहन एवं राजमार्ग) हर्ष मल्होत्रा, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, दिल्ली के सरकार के मंत्री आशीष सूद, मनजिंदर सिंह सिरसा, डॉ. पंकज कुमार, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट रहे। कार्यक्रम के दौरान द कलेक्टेड स्पीचेस ऑफ बंगाल टाइगर आशुतोष मुखर्जी पर आधारित एक विशेष डॉक्यूमेंट्री का भी प्रदर्शन किया गया।
जेपी नड्डा ने कहा कि डॉ. आशुतोष मुखर्जी का सार्वजनिक जीवन संवैधानिक चिंतन, बौद्धिक अनुशासन और भारत की सभ्यतागत मूल्यों के प्रति अटूट निष्ठा से प्रेरित था। उन्होंने पुस्तक में संकलित बत्तीस विधायी भाषणों का उल्लेख करते हुए कहा कि डॉ. मुखर्जी ने भावनात्मक नारों के स्थान पर तर्कपूर्ण संवैधानिक विमर्श के माध्यम से नागरिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय आत्मविश्वास का सशक्त समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ज्ञान और सिद्धांतों पर आधारित डॉ. मुखर्जी का अडिग राष्ट्रवाद आज भी विधायकों, नीति-निर्माताओं और जनप्रतिनिधियों के लिए प्रेरणास्रोत है।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि, “डॉ. आशुतोष मुखर्जी ने यह सिद्ध किया कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति निर्भीक विद्वता, शैक्षणिक उत्कृष्टता और योग्यता-आधारित संस्थानों में निहित होती है। शिक्षा, न्याय और भारत के आत्मसम्मान के प्रति उनके अटूट समर्पण के कारण ही उन्हें ‘बंगाल टाइगर’ के नाम से सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने औपनिवेशिक शासन के दौरान भी शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता की दृढ़ता से रक्षा की, सरकारी विरोध के बावजूद सर सीवी रमन और प्रोफेसर मेघनाद साहा जैसे महान वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे विद्यार्थियों के साथ निर्णायक अवसरों पर मजबूती से खड़े रहे। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी का जीवन साहस, सत्यनिष्ठा और शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली विधानसभा द्वारा प्रकाशित द कलेक्टेड स्पीचेस ऑफ बंगाल टाइगर आशुतोष मुखर्जी उनके असाधारण योगदान को समर्पित एक विनम्र श्रद्धांजलि है, जो शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा भावी पीढ़ियों को भारत के महानतम संस्थान-निर्माताओं में से एक के विचारों से प्रत्यक्ष परिचित कराएगी।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि महान विभूतियों का जीवन केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रत्येक नई पीढ़ी को निरंतर प्रेरित करता रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉ. आशुतोष मुखर्जी केवल एक महान न्यायविद् या शिक्षाविद् ही नहीं थे, बल्कि ऐसे दूरदर्शी व्यक्तित्व थे जिनका संपूर्ण जीवन भारत की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ था।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया है जिसे प्रत्येक पीढ़ी आगे बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि महान संस्थान-निर्माताओं के योगदान का स्मरण और संरक्षण देश की बौद्धिक तथा सांस्कृतिक नींव को सुदृढ़ करने के लिए अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं तथा मूल्य-आधारित शिक्षा पर दिया गया उसका विशेष बल उन सिद्धांतों का ही विस्तार है जिनकी वकालत डॉ. आशुतोष मुखर्जी ने दशकों पूर्व की थी।
दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट ने कहा, “प्रत्येक विधायिका का दायित्व केवल संवैधानिक अभिलेखों का संरक्षण करना ही नहीं, बल्कि उन विचारों को भी सुरक्षित रखना है जिन्होंने राष्ट्र के लोकतांत्रिक विकास को दिशा प्रदान की। यह प्रकाशन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव