(अपडेट) रामजन्मभूमि में साध्वी ऋतंभरा ने किया मां भगवती मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण

 










अयोध्या, 29 मई (हि.स.)। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र परिसर के परकोटा में वायव्य कोण पर बने मां भगवती मंदिर शिखर पर ध्वाजारोहण के बाद आयोजित समारोह में साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि आज की पीढ़ी को भारत की स्त्री होने का अर्थ बताना होगा। उन्होंने आह्वान किया कि आपकी संतानों को पता होना चाहिए कि माथे के सिंदूर की कीमत क्या होती है? भारत की सभ्यता और संस्कृति की रक्षा का दायित्व घर में रहने वाली देवियों का है। इसे गंभीरता से पालन करें, तभी इस कार्यक्रम की पूर्ण सफलता होगी।

शुक्रवार को साध्वी ऋतंभरा ने अपने चिर परिचित तरीके से कहा कि जो कील अवध के सीने में, सदियों से पड़ी कसकती थी। लज्जित थी पीढ़ी दर पीढ़ी, सदियों तक श्राप समझती थी। तुमने झटके से खींच उसे फेंका सरयू के पानी में। फिर जग ने देखा एक बार लहराता ज्वार जवानी में। हम केवल भजनिए नहीं हैं, यह बात उन्हें समझाई है। हम समर बांकुरे राघव के, तुमको सौ बार बधाई है।

साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि हमारे रामलला विराजमान हो गए। हमारी शक्ति की पुनः प्रतिष्ठा हो गई, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने 500 साल की लंबी यात्रा मे पगड़ियां नहीं बांधी, पदत्राण नहीं पहने, इस युग की देवियों ने अपने दो-दो पुत्ररत्न राम जन्मभूमि को समर्पित किया। सरयू का जल रक्त से लाल किया गया। आज भगवती के मंदिर के आसमान पर उसी समर्पण की ध्वजा लहरा रही है। माताओं के बलिदानों के कारण हमें आज यह दिन देखने को मिला। यहां से जाओगे तो प्रसाद के रूप में भगवती जगदंबा का सिंदूर ले जाना, प्रसाद जब घर जाएगा तो आपकी संतानों को पता होना चाहिए कि माथे के सिंदूर की कीमत क्या होती है? हमें स्वतंत्रता और उच्छृंखलता का भेद समझना होगा। क्योंकि शासित होना अनुशासित होना नहीं होता। आप चाहो तो भारत भारत बना रहेगा। आपने चाहा तो दैत्य हिरण्यकश्यप के घर में प्रहलाद का जन्म हो गया था, आपने नहीं चाहा तो ऋषि विश्रवा के घर रावण का जन्म हुआ। अपनी शक्ति को पहचान कर अपने पुत्र दायित्व का बोध लेकर यहां से जाना। मां की ध्वजा जाज्वल्यमान इसी तरह फहराती रहे इसकी गारंटी दुर्गा वाहिनी की दुर्गाएं हैं। यूं तो मैने चाहा था कि घूंघट के पट खोल के दो आंखों से मैं भी जग को देखूं, किंतु आवरण हटे हैं जितने वो मुझकों स्वीकार नहीं हैं। सदियों से मैं पूछ रही हूं गौतम ऋषि का श्राप गलत था, धोबी का आक्षेप गलत था, मति अंधों की धर्म सभा में धर्म धुरंधर भीष्म पिता का नीति निपुण विदुर राज का सबका वो वैवश्य गलत था , किन्तु बरसाती नाले सी उच्छृंखल अपने राघव लवकुश तज कर, स्वर्णमयी लंका को वरती तुम मेरी प्रतिमान नहीं हो, तुम मेरी प्रतिहारी नहीं हो, कोई और नाम तुम खोजो तुम भारत की नारी नहीं हो, भारत की नारी होने के कुछ अर्थ हैं। उसके लिए चिंतन करना होगा कि आंचल की सामर्थ्य कितनी है। उन्होंने मातृशक्ति के मध्य कहा कि आज हमें संकल्प लेना होगा कि हमारी बच्चियां लव जेहाद का शिकार नहीं बनेंगी उसके लिए एक एक बच्ची को दुर्गा बनाने का संकल्प लेते हैं। हमें यह भी संकल्प लेना है कि जब तक गौ माता के रक्त की एक एक बूंद धरती माता को व्याकुल कर रही है तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। गौ माता के हत्या के कलंक के साथ हम गहरी सांस नहीं ले सकते। तुम्हें फिर कौशल्या, सुनैना अंजनी, देवकी बनना होगा। देश से है प्यार तो हर पल ये कहना चाहिएमैं रहूं या ना रहूं भारत ये रहना चाहिएसिलसिला ये बाद मेंरे यूं हि चलना चाहिएमैं रहूं या ना रहूं भारत ये रहना चाहिए ।कार्यक्रम में राष्ट्र सेविका समिति की मीनाक्षी ताई, हरिद्वार से आई महामंडलेश्वर साध्वी मैत्री, केंद्रीय पिछड़ा आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्ष साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी परिषद की महामंत्री साध्वी प्रज्ञा भारती माैजूद रहीं।इसके पूर्व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने उपस्थित मातृ शक्ति को मंदिर व परकोटा का पूर्ण परिचय दिया। उन्होंने कहा कि साध्वी ऋतंभरा जी के साथ वात्सल्य परिवार की लगभग 60 बालिकाएं, माताएं व साध्वियां उपस्थित हैं। विश्व हिंदू परिषद के कार्य में मातृशक्ति हैं दुर्गा वाहिनी की जो कभी पहले बहुत काम करती थी आंदोलन के समय में और वर्तमान में है ऐसी लगभग 250 माता बहनें उपस्थित हैं। इसके अतिरिक्त अयोध्या नगर, महानगर के सामाजिक जीवन के साथ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से कार्य करने वाली 3500 से भी अधिक माता बहनें उपस्थित हैं। मेरे अनुसार आज की संख्या 4000 है।

समारोह मंच पर ट्रस्टी कृष्ण मोहन, महंत दिनेन्द्र दास, डॉ अनिल मिश्रा, मंदिर व्यवस्था से जुड़े विहिप के वरिष्ठ पदाधिकारी गोपाल नागरकट्टे भी उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / पवन पाण्डेय