अशोक सिंघल हिंदू स्वाभिमान के शिखर पुरुष थे: दत्तात्रेय होसबाले

 




नई दिल्ली, 27 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने रविवार को कहा कि अशोक सिंघल का संपूर्ण जीवन धर्म और राष्ट्रसेवा को समर्पित था। वे हिंदू समाज में आत्मसम्मान और चेतना का संचार करने वाले सच्चे शिखर पुरुष थे।

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने आज दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार अशोक सिंघल के जन्म शताब्दी वर्ष समारोह को संबोधित किया।

भगवद्गीता के 18वें अध्याय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, वे सच्चे अर्थों में 'मुक्तसंग', 'अनहंवादी' और 'धृत्युत्साहसमन्वित' कार्यकर्ता थे जिन्हें पद या प्रतिष्ठा का मोह नहीं था और जो सफलता या विफलता से कभी विचलित नहीं हुए। वे केवल एक आंदोलनकारी नहीं बल्कि संगठन, संघर्ष और समन्वय के अनूठे संगम थे। निर्णय लेने में वे वज्र के समान दृढ़ थे, वहीं समाज के संकट और पीड़ा को देखकर उनका हृदय नवनीत की तरह द्रवित हो उठता था। एक संपन्न और सुशिक्षित परिवार से आने के बावजूद उन्होंने संघ के प्रचारक के रूप में पूरा जीवन अत्यंत सादगी और राष्ट्रधर्म की सेवा में बिताया।

होसबाले ने कहा कि अशोक सिंघल का योगदान केवल रामजन्मभूमि आंदोलन तक सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने समाज और संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में युगांतरकारी कार्य किए। उन्होंने प्रयागराज के संगम तट पर देशभर से 1,000 वेदपाठी विद्वानों का समागम कराया। 1994 के नासिक कुंभ में संतों और विद्वानों से परामर्श कर महिलाओं द्वारा वेद मंत्र पाठ का ऐतिहासिक आयोजन कराया और समाज में फैली भ्रांतियों को दूर किया। राम-जानकी यात्रा के दौरान सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सिंघल ने युवाओं की टोली तैयार की, जिसने आगे चलकर 'बजरंग दल' का रूप लिया और धर्म तथा राष्ट्र रक्षा के लिए समर्पित संगठन बना।

उन्होंने राष्ट्रीय एकात्मता यात्रा 1983-84 का जिक्र करते हुए कहा कि अशोक सिंघल ने विहिप में दायित्व संभालते ही गंगा जल, भारत माता और गौ-माता के प्रतीकों के साथ देशव्यापी यात्रा का नेतृत्व किया, जिसे तत्कालीन मीडिया ने 'हिंदू समाज की कुंडलिनी शक्ति का जागरण' कहा था। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के नाम से 'हिंदू' शब्द हटाने के प्रयासों का प्रखर विरोध कर उन्होंने उसे रुकवाया। इसके साथ ही महामना मदन मोहन मालवीय के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए 'मालवीय मिशन' की स्थापना की। रामसेतु की रक्षा के लिए देशव्यापी चेतना जगाई और 1984 में पंजाब के संकट काल में संतों के साथ राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा निकाली।

सरकार्यवाह ने कहा कि अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण और राम वनगमन मार्ग पर 108 राम स्तंभों की स्थापना अशोक सिंघल के संकल्प, सामर्थ्य और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक हैं। उन्होंने आह्वान किया कि मंदिर निर्माण के उपरांत अब 'रामराज्य' की स्थापना के लिए निरंतर कार्य करना ही अशोक सिंघल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी