जेन ज़ी युवाओं पर संघ का पूरा भरोसा: सुनील आंबेकर
पुणे, 17 जून (हिं.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा, “देश की नई यानी ‘जेन ज़ी’ पीढ़ी को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेहद आशावादी है। आज के युवा अपनी परंपराओं और भारत के गौरव से गहराई से जुड़े हुए हैं और समाज में रचनात्मक बदलाव के लिए बड़ा योगदान दे रहे हैं।
पुणे श्रमिक पत्रकार संघ द्वारा आयोजित संवाद कार्यक्रम में आंबेकर ने संघ के शताब्दी सफर, संघ की रजिस्ट्रेशन स्थिति, ‘जेन ज़ी’ युवा, जनसंख्या असंतुलन और मुस्लिम समाज पर संघ के दृष्टिकोण जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में सभी स्तरों पर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होते हैं। हमारी न्यायपालिका, प्रशासन और मीडिया स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। ऐसे मजबूत लोकतंत्र में यदि कोई अपनी बात उठाता है, तो व्यवस्था में उसे समझने और संबोधित करने की क्षमता होनी चाहिए। इसलिए ऐसे आंदोलनों से हैरान होने की जरूरत नहीं है।
संघ के रजिस्ट्रेशन को लेकर चल रही चर्चाओं पर आंबेकर ने बताया कि संघ के पंजीकरण को लेकर कोई कानूनी विवाद नहीं है, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम फैलाया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त सामाजिक संगठन है। विभिन्न सरकारों ने समय-समय पर संघ का सहयोग लिया है। संघ की शाखाओं को पुलिस की अनुमति मिलती है और स्थानीय शाखाओं के नाम पर बैंक खाते भी संचालित होते हैं। सभी आर्थिक लेन-देन बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ही होते हैं।
मुस्लिम समाज और संघ के संबंधों पर पूछे गए सवाल के जवाब में आंबेकर ने बताया कि संघ की स्थापना से पहले से ही देश में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष मौजूद रहा है। दुर्भाग्य से, कुछ लोगों में यह धारणा बनाई गई कि धर्म बदलने से राष्ट्र और इतिहास भी बदल जाता है, और इसी मानसिकता ने देश के विभाजन में भूमिका निभाई। यह विवाद अब समाप्त होना चाहिए। सभी का डीएनए एक ही है। मुस्लिम समाज के भीतर भी सकारात्मक सामाजिक बदलाव की पहल हो रही है। भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान के बजाय इंडोनेशिया जैसे सांस्कृतिक आदर्शों की ओर देखना चाहिए।
जनसंख्या संतुलन पर चिंता जाहीर करते हुए आंबेकर ने कहा कि यूरोप और चीन जैसे देशों ने अपनी जनसंख्या नीतियों में बदलाव किया है, इसलिए भारत के लिए जनसंख्या संतुलन बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने 1947 के विभाजन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आंशिक रूप से जनसांख्यिकीय बदलावों का परिणाम था।
उन्होंने कहा, “यदि भविष्य में जनसंख्या असंतुलन बढ़ता है, तो देश की पहचान और संस्कृति को बनाए रखना कठिन हो सकता है। इसलिए हिंदू संस्कृति को मानने वालों की बहुलता देश के हर हिस्से में बनी रहनी चाहिए। हालांकि संघ प्रमुख द्वारा इस पर कोई अनिवार्य आदेश नहीं दिया गया है, बल्कि यह प्रत्येक परिवार की परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार अपनाने योग्य सांस्कृतिक दृष्टिकोण है।--------------
हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी