सीसीएफआई की 63वीं एजीएम में टिकाऊ कृषि, रसायनों के संतुलित इस्तेमाल और निर्यात पर जोर

 










नई दिल्ली, 30 सितंबर (हि.स.)। क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीसीएफआई) की 63वीं वार्षिक आम बैठक में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ जमीन की सेहत, रसायनों के संतुलित इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन की चुनौती, टिकाऊ खेती और एग्रोकेमिकल उत्पादों की गुणवत्ता एवं निर्यात क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के अनियंत्रित इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए जमीन और मानव स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई, जबकि पूर्व केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बदलते मौसम और जलवायु संकट के बीच उद्योग को नई तकनीक और सकारात्मक नियामक विकल्पों के साथ आगे बढ़ने का सुझाव दिया।

यहां बुधवार को सीसीएफआई की एजीएम का मुख्य विषय “एग्रोकेमिकल्स: कृषि विकास, स्थिरता और निर्यात सुनिश्चित करना” था। कार्यक्रम में कृषि एवं एग्रोकेमिकल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों और युवा मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने कृषि में रसायनों के इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन, अनुसंधान एवं विकास, नियामक व्यवस्था, गुणवत्ता, विनिर्माण और निर्यात से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने कहा कि ज्यादा उपज की होड़ में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जिससे जमीन और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने ‘कैंसर एक्सप्रेस’ जैसी स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि अब केवल होटल के कमरों में विचार-विमर्श करने के बजाय जमीन पर ठोस काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जमीन स्वस्थ रहेगी तभी देश स्वस्थ रहेगा।

ठाकुर ने बताया कि सरकार जमीन की डिजिटल पहचान यानी लैंड आईडी तैयार कर रही है, ताकि जमीन की जरूरत के अनुसार खाद और कृषि रसायनों का इस्तेमाल किया जा सके। उन्होंने उद्योग जगत, वैज्ञानिकों और पूंजीपतियों से सवाल किया कि आखिर कीटनाशकों की जरूरत इतनी क्यों बढ़ रही है। कृषि क्षेत्र में ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है जिसमें उत्पादन बढ़ाने के साथ जमीन और मानव स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाए।

उन्होंने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि 33 जिलों में 56 लाख किसान करीब 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि रासायनिक तरीके से उगाई गई सब्जियों और प्राकृतिक खेती से उगाई गई सब्जियों में बड़ा अंतर है। उद्योग जगत किसानों की भलाई के लिए जो भी व्यावहारिक निर्णय लेगा, सरकार अपनी क्षमता और आर्थिक स्थिति के अनुसार उन पर संवेदनशीलता से विचार करेगी।

कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कृषि और एग्रोकेमिकल उद्योग के सामने जलवायु परिवर्तन को सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष अल नीनो के कारण कुल वर्षा में करीब 20 फीसदी की कमी आई है और पारंपरिक एग्रो-क्लाइमैटिक जोन तेजी से बदल रहे हैं।

जावड़ेकर ने कहा कि दक्षिण भारत, बिहार और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में मौसम का असंतुलन है, जबकि राजस्थान के रेगिस्तान और कच्छ में असामान्य बारिश हो रही है। कम समय में अत्यधिक बारिश, क्लाउडबर्स्ट और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं से उपजाऊ मिट्टी बह रही है। उन्होंने इसे कृषि और एग्रोकेमिकल उद्योग दोनों के लिए चुनौती बताया।

उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया की केवल 2.4 फीसदी भूमि और चार फीसदी ताजे जल संसाधन हैं, जबकि देश को दुनिया की 18 फीसदी मानव आबादी और 18 फीसदी पशुधन का भरण-पोषण करना है। ऐतिहासिक रूप से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी करीब तीन फीसदी रही है और वर्तमान में यह सात फीसदी है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने कारोबार को सुगम बनाने के लिए करीब 25 से 30 हजार अनावश्यक अनुपालनों को समाप्त किया है और आगे भी प्रक्रिया को आसान बनाया जा रहा है। उन्होंने नीम कोटेड यूरिया, सॉयल हेल्थ कार्ड, किसान सम्मान निधि और फसल बीमा योजना जैसी पहलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसान सम्मान निधि के तहत 10 करोड़ किसानों को 46,000 रुपये मिले हैं, जबकि 34 हजार करोड़ रुपये के प्रीमियम के एवज में फसल बीमा योजना के तहत 1.83 लाख करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया है।

कृषि आयुक्त डॉ. पीके सिंह ने कहा कि टिकाऊ कृषि केवल रसायनों के इस्तेमाल से नहीं आएगी, बल्कि रोग-प्रतिरोधी और जलवायु अनुकूल फसल किस्मों के विकास से भी इसे हासिल किया जा सकता है। वैज्ञानिक यदि उन्नत किस्में विकसित करते हैं तो खेतों में रसायनों का भार स्वतः कम हो सकता है।

उन्होंने कहा कि वैश्विक युद्ध और आपूर्ति बाधाओं के कारण इस वर्ष उर्वरक सब्सिडी का बिल 2.50 लाख करोड़ रुपये के पार जाने की संभावना है। कीट-पतंगों में रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही है। इसलिए उद्योग को 20-25 साल पुरानी तकनीकों पर निर्भर रहने के बजाय अनुसंधान एवं विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।

डॉ. सिंह ने नैनो-पेस्टीसाइड्स, बायोस्टिमुलेंट्स और सुरक्षित हर्बीसाइड्स के विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता निर्यात की एकमात्र कुंजी है। नए कीटनाशक प्रबंधन विधेयक में गुणवत्ता और ट्रेसिबिलिटी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि उत्पाद कहां बना और किस किसान तक पहुंचा।

एजीएम के तकनीकी सत्रों में एग्रोकेमिकल क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदारी, जापानी कंपनियों की अनुसंधान में बढ़ती भूमिका, बैकवर्ड इंटीग्रेशन के जरिए भारत को विनिर्माण केंद्र बनाने तथा नियामक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। एमआरएल और आईपीएमएस से संबंधित विषयों पर भी विशेषज्ञों और युवा मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने विचार रखे।

तकनीकी चर्चाओं में कृषि विकास, टिकाऊपन और निर्यात को एक साथ आगे बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया गया। उद्योग के सामने बदलते जलवायु पैटर्न, फसल उत्पादन की चुनौतियों, कीटों में रसायनों के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता, उत्पादों की गुणवत्ता और नियामक मानकों के अनुरूप उत्पादन जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

सीसीएफआई के उपाध्यक्ष ओमवीर त्यागी ने धन्यवाद ज्ञापन में केंद्रीय राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर का आभार जताया।

उल्लेखनीय है कि क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया देश के 50 प्रमुख एग्रोकेमिकल कॉरपोरेट्स का शीर्ष संगठन है। उसकी 63वीं वार्षिक आम बैठक में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ जमीन और पर्यावरण की सेहत बनाए रखने, एग्रोकेमिकल क्षेत्र में नई तकनीकों और अनुसंधान को बढ़ावा देने तथा भारत की विनिर्माण और निर्यात क्षमता मजबूत करने से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर