188 साल बाद पूर्वी हिमालय में विलुप्तप्राय पौधे की पुनर्खोज, जर्मनी की प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित शोध
कोलकाता, 21 मई (हि.स.)। पूर्वी हिमालय के जैव विविधता क्षेत्र से एक बेहद दुर्लभ और विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके पौधे की 188 साल बाद पुनर्खोज की गई है। इस महत्वपूर्ण खोज पर आधारित शोधपत्र जर्मनी की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका फेडेस रेपर्टोरियम — जर्नल ऑफ बॉटनिकल टैक्सोनॉमी एंड जियोबॉटनी में सोमवार को (18 मई, 2026) को प्रकाशित हुआ है। यह पत्रिका स्कोपस और एल्सेवियर सूचीबद्ध तथा उच्च प्रभाव कारक वाली अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका मानी जाती है।
शोधपत्र का शीर्षक है —“वैक्सीनियम पिलिफेरम की पुनर्खोज : पूर्वी हिमालय जैव विविधता क्षेत्र की एक विलुप्तप्राय प्रजाति”।
जानकारी के अनुसार अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के विजयनगर क्षेत्र के बाहरी इलाके से अक्टूबर 2024 में वनस्पति विज्ञान के छात्र एवं शोधकर्ता विनय कुमार साहनी ने इस दुर्लभ पौधे को एकत्र किया था। इसके बाद प्रसिद्ध भारतीय ब्लूबेरी विशेषज्ञ डॉ. सुभाषिस पांडा ने इस पौधे की पहचान वैक्सीनियम पिलिफेरम के रूप में की। डॉ. पांडा इस पौधा समूह के विशेषज्ञ हैं और उन्होंने सेंट्रल नेशनल हर्बेरियम तथा आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान में प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
डॉ. पांडा ने इस शोधपत्र को तैयार किया और संवाददाता लेखक के रूप में पौधे का विस्तृत अध्ययन किया।
डॉ. पांडा ने गुरुवार को हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि इस पौधे को पहली बार 26 नवंबर 1836 को ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक विलियम ग्रिफिथ ने मिश्मी पर्वतीय क्षेत्र, वर्तमान दिबांग वैली जिले, से खोजा था। इसके बाद लगभग 188 वर्षों तक इस प्रजाति का कोई पता नहीं चल पाया।
विशेष बात यह रही कि डॉ. पांडा और उनकी टीम ने इस पौधे को फूल और फल —दोनों अवस्थाओं में एक साथ दर्ज किया, जो विज्ञान की दुनिया में नई उपलब्धि मानी जा रही है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पुनर्खोज से संरक्षण विशेषज्ञों, ऊतक संवर्धन वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों के लिए इस विलुप्तप्राय प्रजाति के संरक्षण तथा भविष्य में उसके अस्तित्व को बचाने के नए रास्ते खुलेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय