पीओके के पूर्व राष्ट्रपति राजा मोहम्मद जुलकरनैन खान का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार

 


इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद, 08 नवंबर (हि.स.)। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के पूर्व राष्ट्रपति राजा मोहम्मद जुलकरनैन खान का रविवार दोपहर उनके पैतृक शहर कसगुमा (भीम्बर जिले में) में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनका निधन

शनिवार को संघीय राजधानी इस्लामाबाद के एक अस्पताल में संक्षिप्त बीमारी के बाद हो गया था। उन्होंने 93 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। पीओके सरकार ने रविवार को एक दिन के आधिकारिक शोक की घोषणा की।

डान समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार आज राज्य का झंडा आधा झुका रहा। सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि दिवंगत नेता का रविवार दोपहर उनके पैतृक शहर कसगुमा (भीम्बर जिले में) में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। 15 मार्च, 1933 को जन्मे राजा जुलकरनैन के पिता खान बहादुर राजा मोहम्मद अफजल खान चिब राजपूत समुदाय से थे। वह आईसीएस अधिकारी थे और महाराजा हरि सिंह के प्रशासन में काम करते थे। उन्हें भीम्बर जिले में जागीर (संपत्ति) मिली थी।

राजा जुलकरनैन ने अपनी शुरुआती शिक्षा श्रीनगर और दिल्ली में प्राप्त की। 13 साल की उम्र में लॉरेंस कॉलेज (घोरा गली) में दाखिला लिया। वहां उनके साथ पढ़ने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री ज़फरुल्लाह जमाली और बलोचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री सरदार अकबर बुगती भी शामिल थे। 1955 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से स्नातक करने के बाद उन्होंने 1958 में कराची में यूनाइटेड बिल्डर्स की स्थापना करके निर्माण व्यवसाय में कदम रखा। बाद में इस कंपनी ने पाकिस्तान, पीओके, यूएई और इराक में कई परियोजनाओं पर काम किया।

राजा जुलकरनैन ने 1960-61 में राजनीति में प्रवेश किया। वह पीओके के पूर्व राष्ट्रपति और कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना के निजी सचिव रहे केएच खुर्शीद के सहयोगी थे। पाकिस्तान में जनरल अयूब खान की बुनियादी लोकतंत्र प्रणाली के तहत हुए पहले चुनाव में उन्हें अपनी पैतृक यूनियन काउंसिल (कसगुमा) का चेयरमैन चुना गया। 1962 में खुर्शीद ने 'जम्मू कश्मीर लिबरेशन लीग' की स्थापना कर राजा को इसका संस्थापक महासचिव नियुक्त किया।

1975 में संसदीय प्रणाली के तहत पीओके के पहले आम चुनाव से पहले राजा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) में शामिल हो गए और समाहनी से विधानसभा के लिए चुने गए। जनरल जिया-उल-हक के मार्शल लॉ के बाद जब राजनीतिक गतिविधियां फिर से शुरू हुईं तो वे मुस्लिम कॉन्फ्रेंस में शामिल हो गए और 1985 में इसी पार्टी के टिकट पर भीमबर से चुनाव जीता। उन्होंने सरदार सिकंदर हयात के मंत्रिमंडल में पांच साल तक काम किया। 1990 में वे विधानसभा चुनाव में पीपीपी उम्मीदवार चौधरी सोहबत अली से हार गए। 1991 में वे फिर से विधानसभा पहुंचे और सरदार अब्दुल कय्यूम खान के मंत्रिमंडल में पांच साल तक रहे। 1996 में एमसी के टिकट पर वह पीओके काउंसिल के लिए चुने गए।

इसी साल के आम चुनाव में उन्होंने चौधरी तारिक फारूक का समर्थन किया। फारूक पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए। 2001 के चुनाव से पहले स्थानीय प्रतिद्वंद्विता के कारण उनका राजनीतिक साथ छूट गया। फारूक ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और राजा को हरा दिया। 2006 में राजा ने एमसी उम्मीदवार फारूक का विरोध किया, जिससे चौधरी अनवर-उल-हक को बहुत कम अंतर से अपनी पहली विधानसभा सीट जीतने में मदद मिली। उसी साल अगस्त में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस ने उन्हें पीओके का राष्ट्रपति चुना। वे अगस्त 2011 तक इस पद पर रहे।

पीओके विधानसभा के अध्यक्ष चौधरी तारिक फारूक ने राजा के निधन को जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक, संसदीय और सामाजिक हलकों के लिए एक बड़ा नुकसान बताया। पीओके के पूर्व प्रधानमंत्री सरदार तनवीर इलियास ने भी राजा जुलकरनैन के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद