नेपाल में अगले शैक्षणिक सत्र से ‘बुक फ्री फ्राइडे’ और ‘स्किल इन एजुकेशन’ योजना लागू करने की तैयारी
काठमांडू, 13 सितंबर (हि.स.)। नेपाल सरकार विद्यालय शिक्षा को अधिक व्यावहारिक और कौशल-आधारित बनाने के उद्देश्य से अगले शैक्षणिक सत्र से देशभर में ‘बुक फ्री फ्राइडे’ और ‘स्किल इन एजुकेशन’ अवधारणा लागू करने की तैयारी कर रही है।
शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने कहा कि अगले शैक्षणिक सत्र से विद्यार्थियों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर व्यावहारिक ज्ञान, कौशल और जीवनोपयोगी शिक्षा से जोड़ने के लिए ‘बुक फ्री फ्राइडे’ और ‘स्किल इन एजुकेशन’ कार्यक्रम लागू करने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि बदलते समय, तकनीक के विकास और रोजगार की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विद्यालय शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रारूप में संशोधन किया जा रहा है। इसके लिए कार्यदल का गठन किया गया है और देशभर में विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों तथा अन्य संबंधित पक्षों से सुझाव लिए जा रहे हैं।
मंत्री ने कहा कि प्राप्त सुझावों के आधार पर नया पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा और इसके बाद नए पाठ्यक्रम के अनुसार पाठ्यपुस्तकों की छपाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। मंत्री पोखरेल ने कहा कि मौजूदा पाठ्यक्रम समय की जरूरत के अनुरूप जीवनोपयोगी और व्यावहारिक शिक्षा देने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। इसलिए नई पीढ़ी की जरूरतों और भविष्य को केंद्र में रखकर नया पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा।
शिक्षामंत्री के प्रमुख सलाहकार शैलेन्द्र झा ने बताया कि राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रारूप को अधिक प्रभावी और कार्यान्वयन योग्य बनाने के लिए समुदाय स्तर तक पहुंचकर विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और अन्य संबंधित पक्षों से सुझाव लिए जा रहे हैं। उन्होंने शिक्षा को समयानुकूल, व्यावहारिक, तकनीक-अनुकूल और जीवनोपयोगी बनाने पर जोर दिया।
पाठ्यक्रम विकास केंद्र के कार्यकारी निदेशक महेंद्र पराजुली ने बताया कि राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रारूप में संशोधन के लिए गठित कार्यदल काम कर रहा है। प्राप्त सुझावों के आधार पर आवश्यक संशोधन करके नए पाठ्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा।
सातों प्रदेशों में आयोजित कार्यशालाओं से विद्यालय शिक्षा को व्यावहारिक, कौशल-आधारित, तकनीक-अनुकूल और रोजगारमुखी बनाने के सुझाव मिले हैं। प्रतिभागियों ने कहा कि विद्यार्थियों को केवल तकनीक के इस्तेमाल में दक्ष बनाने के बजाय तकनीक विकसित करने में सक्षम बनाने वाला पाठ्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए।
कोशी प्रदेश में बार-बार पाठ्यक्रम बदलने के बजाय उसके प्रभावी कार्यान्वयन पर जोर देने और पर्याप्त शिक्षक व्यवस्था के बिना नए पाठ्यक्रम को लागू करना मुश्किल होने की बात उठाई गई। मधेस प्रदेश से नैतिक एवं संस्कृत शिक्षा, एआई और कंप्यूटर तकनीक, जलवायु परिवर्तन, ‘ग्रीन स्कूल’, तकनीकी शिक्षा और साइबर सुरक्षा जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का सुझाव आया है। बागमती प्रदेश के प्रतिभागियों ने पूर्वी दर्शन, संस्कृत एवं नैतिक शिक्षा, स्थानीय ज्ञान, कौशल और संस्कृति के साथ ‘कम्युनिटी करिकुलम’ और ‘नेचर लर्निंग’ को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया।
गंडकी प्रदेश से पाठ्यक्रम को वैज्ञानिक और व्यावहारिक बनाने, कौशल-आधारित शिक्षा को प्राथमिकता देने तथा मूल्यांकन प्रणाली को दिव्यांग-अनुकूल बनाने का सुझाव आया है। सुदूरपश्चिम प्रदेश के प्रतिभागियों ने कार्य घंटे कम करने, मानव मूल्य शिक्षा को प्राथमिकता देने और कक्षा 10 तथा 11 के बीच विषयवस्तु के अंतर को कम करने का सुझाव दिया। वहीं, कर्णाली प्रदेश से अगले 15 से 20 वर्षों में आवश्यक मानव संसाधन का अनुमान लगाकर उसी के अनुरूप पाठ्यक्रम में संशोधन करने की बात कही गई।
पाठ्यक्रम विकास केंद्र के अनुसार, पहले चरण में सातों प्रदेशों के 28 जिलों में विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ संवाद कर सुझाव लिए जा रहे हैं। इसके बाद दूसरे चरण में देश के सभी 77 जिलों में पहुंचकर सुझाव एकत्र किए जाएंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास