जर्मनी से नेपाल लौटे 13वीं से 20वीं सदी के 800 से अधिक ऐतिहासिक दस्तावेज

 




काठमांडू, 04 अक्टूबर (हि.स.)। नेपाल के 13वीं से 20वीं सदी तक के 800 से अधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज, जो जर्मन नागरिक जोसेफ पीटर रिंडफ्लाइश के निजी संग्रह में थे, नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखालय को सौंप दिए गए हैं।

आज राष्ट्रीय अभिलेखालय में आयोजित एक कार्यक्रम में हीडलबर्ग विश्वविद्यालय की हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज के प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स, डॉ. माणिक बज्राचार्य और राजन खेतवाड़ी ने संयुक्त रूप से इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को विदेश मंत्री शिशिर खनाल को सौंपा।

प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स, जोसेफ रिंडफ्लाइश के बेटे वाल्टर रिंडफ्लाइश के मित्र हैं। वाल्टर ने अपने पिता के दस्तावेजों को नेपाल वापस पहुंचाने के लिए प्रोफेसर माइकल्स को सौंपा था। इसके बाद प्रोफेसर माइकल्स ने हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के माध्यम से इन दस्तावेजों को नेपाल को वापस किया।

इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को विदेश मंत्री शिशिर खनाल की मौजूदगी में राष्ट्रीय अभिलेखालय को सौंपा गया। इन्हें नेपाल वापस लाने में जर्मनी स्थित नेपाली दूतावास, हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज, सराफ फाउंडेशन और राष्ट्रीय अभिलेखालय ने सहयोग किया।

विदेश मंत्री खनाल ने कहा कि इन ऐतिहासिक दस्तावेजों की देश में वापसी से नेपाल की सांस्कृतिक अखंडता और अपनी सभ्यतागत विरासत पर संप्रभु स्वामित्व बहाल हुआ है।

उन्होंने कहा, “हमारी कला, साहित्य, परंपराएं और पवित्र ग्रंथ केवल भौतिक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं। इनमें सदियों की दार्शनिक सोच, राजनीतिक शासन व्यवस्था, कानूनी ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन समाहित है। हर ऐतिहासिक दस्तावेज की उसकी मूल भूमि में वापसी सांस्कृतिक अधिकारों की बहाली और अपनी सभ्यतागत विरासत पर संप्रभु स्वामित्व की पुनर्पुष्टि है।”

मंत्री खनाल ने दिवंगत जोसेफ पीटर रिंडफ्लाइश की उस इच्छा को भी याद किया, जिसमें उन्होंने अपने निजी संग्रह में मौजूद 800 से अधिक महत्वपूर्ण नेपाली दस्तावेजों को नेपाल लौटाने की इच्छा जताई थी। उन्होंने सांस्कृतिक विरासत के प्रति रिंडफ्लाइश के सम्मान और दूरदर्शी सोच की सराहना की।

उन्होंने कहा कि रिंडफ्लाइश के बेटे वाल्टर ने अपने पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए दस्तावेजों को हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान के प्रोफेसर डॉ. एक्सेल माइकल्स को सौंपा।

विदेश मंत्री ने बताया कि इस असाधारण संग्रह में प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियां, शाही फरमान, अदालती आदेश, संस्कृत ग्रंथ और ऐतिहासिक यात्राओं के विवरण शामिल हैं। ये दस्तावेज नेपाल के राजनीतिक, कानूनी और बौद्धिक विकास को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

मंत्री खनाल ने दस्तावेजों की पहचान, अभिलेखीकरण और नेपाल वापसी में योगदान के लिए प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स और उनकी शोध टीम की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि उनकी अकादमिक ईमानदारी, शोध और लगातार किए गए प्रयासों के कारण इन ऐतिहासिक दस्तावेजों की वापसी संभव हुई।

क्या-क्या शामिल हैं संग्रह में?

नेपाल से 1780 के दशक से लेकर 1990 के दशक के दौरान एकत्र किए गए इस संग्रह में 800 से अधिक आधिकारिक दस्तावेज शामिल हैं। इनमें ‘ताडपत्र’ यानी ताड़पत्र पांडुलिपियां, ‘रुक्का’ और ‘लालमोहर’ प्रमुख हैं।

हीडलबर्ग विश्वविद्यालय पुस्तकालय और हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज ने इस संग्रह को संरक्षित और सूचीबद्ध किया था। बाद में नेपाल सरकार के सहयोग से इन्हें नेपाल वापस लाया गया। संग्रह की कुछ ताड़पत्र पांडुलिपियां नेपाल के सबसे पुराने दस्तावेजों में शामिल हैं।

संग्रह की सूची के अनुसार इसमें—

- मल्लकालीन 465 ताड़पत्र पांडुलिपियां, जिन पर लालमोहर लगी हुई है।

- शाह और राणा काल के 312 कानूनी दस्तावेज और राजकीय कागजात, जिन पर मिट्टी की मुहर लगी है।

- राणा प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित 18 हस्तलिखित पुस्तकें और यात्रा डायरी।

-विभिन्न विषयों पर 11 हस्तलिखित पुस्तकें शामिल हैं।

विदेश मंत्री खनाल ने कहा कि नेपाल और जर्मनी दोनों 1970 की यूनेस्को संधि के पक्षकार हैं, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक संपत्तियों के अवैध आयात, निर्यात और स्वामित्व हस्तांतरण को रोकना है। उन्होंने कहा कि इन दस्तावेजों की वापसी इस अंतरराष्ट्रीय संधि की भावना और साझा प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

उन्होंने दस्तावेजों की वापसी में सहयोग के लिए जर्मन सरकार, काठमांडू स्थित जर्मन दूतावास और हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रति आभार व्यक्त किया।

मंत्री खनाल ने बताया कि 24 अप्रैल 2026 को प्रोफेसर डॉ. एक्सेल माइकल्स ने औपचारिक रूप से ये दस्तावेज बर्लिन स्थित नेपाली दूतावास को सौंपे थे। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में नेपाली दूतावास, विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय अभिलेखालय के बीच हुए समन्वय की भी सराहना की।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास