नेतृत्व संकट के बीच नेपाली कांग्रेस में टूट, गगन थापा बने अलग गुट के अध्यक्ष

 


काठमांडू, 14 जनवरी (हि.स.)। नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक सुधार को लेकर लंबे समय से जारी खींचतान के बाद नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी नेपाली कांग्रेस आखिरकार विभाजन के दौर में पहुंच गई है। पार्टी अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा के नेतृत्व वाले गुट ने महामंत्री गगन थापा, विश्वप्रकाश शर्मा और सह-महामंत्री फरमुल्लाह मंसूर के खिलाफ पांच वर्षों के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा कर दी है।

इसी बीच, देउवा नेतृत्व के विरोध में आयोजित विशेष महाधिवेशन ने गगन थापा को पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुन लिया है। हालांकि, इस निर्णय की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन इससे कांग्रेस के भीतर गहराते मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।

विशेष महाधिवेशन के समर्थक नेताओं का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में देउवा के नेतृत्व में पार्टी को चुनावी मैदान में ले जाना संभव नहीं है। वे लंबे समय से नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे थे, लेकिन पार्टी अध्यक्ष के पद छोड़ने से लगातार इनकार के चलते अंततः संगठन दो हिस्सों में बंट गया।

पार्टी के भीतर सुधार की मांग करने वाले और यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर गुटों के बीच चला आ रहा संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। कांग्रेस की केंद्रीय समिति ने गगन थापा सहित अन्य नेताओं पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की है।

अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा के बाद गगन थापा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि नेपाली कांग्रेस किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “यह वह पार्टी है जिसने देश के राजनीतिक इतिहास को दिशा दी है और बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है।”

देउवा पक्ष का तर्क रहा है कि चुनाव की तैयारी के बीच विशेष महाधिवेशन कराना व्यावहारिक नहीं है। इसी आधार पर केंद्रीय कार्यसमिति ने नियमित महाधिवेशन के लिए बैशाख के अंतिम सप्ताह की तिथि भी तय कर दी थी।

हालांकि, पार्टी के 54 प्रतिशत महाधिवेशन प्रतिनिधि पहले ही विशेष महाधिवेशन की मांग कर चुके थे, जिससे विवाद और गहरा गया।

नियमित महाधिवेशन की तारीख घोषित होने के बाद संस्थापन पक्ष ने विशेष महाधिवेशन को असंभव बताते हुए अपना रुख और सख्त कर लिया। वहीं, विशेष महाधिवेशन समर्थकों का कहना था कि पार्टी के विधान में इस तरह के अधिवेशन का स्पष्ट प्रावधान है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

विशेष महाधिवेशन के पक्षधर नेताओं ने पुस 28 तक महाधिवेशन बुलाने की मांग को लेकर दिए गए आवेदन की समयसीमा समाप्त होने के बाद किसी भी परिस्थिति में अधिवेशन कराने का निर्णय लिया और उसी अनुरूप प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

महाधिवेशन के दौरान पार्टी को टूट से बचाने के लिए कई दौर की बातचीत भी हुई। दोनों गुटों ने वार्ता समितियां गठित कर संदेशों का आदान-प्रदान किया, लेकिन कोई भी पक्ष अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ। अंततः यह राजनीतिक टकराव पार्टी विभाजन में तब्दील हो गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास