फिल्म समीक्षा : सस्पेंस और थ्रिलिंग से दर्शकों को बांधे रखती है 'ऑब्सेस'
कलाकार: पीटर विल्सन, ईशा सिंह
निर्देशक: पीटर विल्सन
निर्माता: जगदीश सिंह, पीटर विल्सन
रेटिंग: ⭐⭐⭐½
बॉलीवुड में प्रयोगधर्मी और मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्मों का अपना एक अलग दर्शक वर्ग रहा है। 'ऑब्सेस' भी ऐसी ही एक फिल्म है, जो बेहद सीमित किरदारों और कम संवादों के बावजूद दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल रहती है। यह सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं, बल्कि इंसानी मानसिकता, गुस्से और अहंकार के खतरनाक टकराव की कहानी है। निर्देशक पीटर विल्सन ने फिल्म को पारंपरिक मसाला फिल्मों से अलग रखते हुए एक इंटेंस और असहज माहौल में पेश किया है, जो धीरे-धीरे दर्शकों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
कहानी
फिल्म की शुरुआत उत्तर भारत के एक सुनसान इलाके से होती है, जहां मानसिक रूप से अस्थिर पीटर एक के बाद एक खौफनाक हत्याएं करता नजर आता है। समाज और लोगों से खुद को ठुकराया हुआ महसूस करने वाला पीटर धीरे-धीरे एक खतरनाक मानसिक स्थिति में पहुंच चुका है, जहां उसे हर गलत चीज का हल हिंसा में नजर आता है। दूसरी तरफ सारा है, जो अपने पति से अलग रह रही एक आत्मनिर्भर लेकिन गुस्सैल महिला है। वह अपने बेटे को लेकर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना चाहती है और किसी के सामने झुकना पसंद नहीं करती।
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब सड़क पर हुई एक छोटी-सी बहस पीटर और सारा के बीच खतरनाक टकराव में बदल जाती है। पीटर का मानसिक असंतुलन और सारा का आत्मसम्मान दोनों मिलकर ऐसी स्थिति पैदा करते हैं, जहां एक मासूम बच्चे की जिंदगी दांव पर लग जाती है। इसके बाद फिल्म लगातार तनाव, डर और मनोवैज्ञानिक खेल के जरिए दर्शकों को बांधे रखती है। कहानी धीरे-धीरे एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां हर दृश्य बेचैनी और खतरे का एहसास कराता है।
निर्देशन
पीटर विल्सन ने निर्देशक के रूप में एक साहसी और प्रयोगधर्मी कोशिश की है। सिर्फ दो मुख्य किरदारों के सहारे पूरी फीचर फिल्म को दिलचस्प बनाए रखना आसान नहीं होता, लेकिन वह इसमें काफी हद तक सफल नजर आते हैं। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका वातावरण और ट्रीटमेंट है। लंबे शांत दृश्य, सीमित संवाद और किरदारों के चेहरे के हावभाव कहानी को आगे बढ़ाते हैं। निर्देशक ने पीटर के मानसिक संघर्ष और सारा के भीतर की जिद दोनों को प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारा है। हालांकि फिल्म की धीमी रफ्तार कुछ दर्शकों को भारी लग सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक थ्रिलर पसंद करने वालों के लिए यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
अभिनय
फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभावित पीटर विल्सन करते हैं। एक मानसिक रूप से विक्षिप्त और हिंसक इंसान के किरदार में उनका अभिनय बेहद स्वाभाविक और डरावना लगता है। कम संवादों के बावजूद उनके चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज किरदार की बेचैनी और गुस्से को प्रभावी तरीके से सामने लाते हैं। ईशा सिंह ने सारा के किरदार में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। एक आत्मनिर्भर महिला से लेकर अपने बच्चे के लिए डरी हुई मां तक के भाव उन्होंने बेहद ईमानदारी से निभाए हैं। खासकर पीटर के साथ उनके आमने-सामने वाले दृश्य काफी प्रभावशाली बन पड़े हैं। दोनों कलाकारों के बीच कम संवाद होने के बावजूद स्क्रीन पर बना तनाव ही फिल्म की असली ताकत बन जाता है।
फाइनल वर्डिक्ट
'ऑब्सेस' एक अलग तरह की मनोवैज्ञानिक क्राइम थ्रिलर है, जो कम संवाद और सीमित किरदारों के बावजूद दर्शकों को गहरी बेचैनी और तनाव का अनुभव कराती है। फिल्म सड़क पर होने वाली छोटी-सी बहस के खतरनाक परिणामों को बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाती है। दमदार अभिनय, इंटेंस माहौल और थ्रिलिंग ट्रीटमेंट के कारण यह फिल्म रेगुलर कमर्शियल सिनेमा से अलग नजर आती है। अगर आप प्रयोगधर्मी और मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्मों के शौकीन हैं, तो 'ऑब्सेस' आपके लिए एक दिलचस्प और यादगार सिनेमाई अनुभव साबित हो सकती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / लोकेश चंद्र दुबे