मुंबई की मुश्किल राह में बाप्पा बने सहारा : सोनू सूद
हर साल गणपति बाप्पा जब सोनू सूद के घर आते हैं, तो उनके साथ सिर्फ उत्सव की खुशियां नहीं आतीं, बल्कि 26 साल पुरानी यादें भी लौट आती हैं। यह वही रिश्ता है, जो मुंबई में उनके संघर्ष के दिनों में शुरू हुआ था। जब सोनू इस शहर में अपनी पहचान बनाने के सपने के साथ आए थे, तब उन्होंने बाप्पा से अपने मन की एक बात कही थी और उन्हें घर लाने का संकल्प लिया था। आज इतने वर्षों बाद भी वह परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ जारी है।
सोनू के लिए बाप्पा सिर्फ आराध्य नहीं हैं, बल्कि वह साथी हैं, जिन्होंने उन्हें मुश्किल समय में संभाला, आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और जिंदगी को एक मकसद के साथ देखने की सीख दी। गणपति उत्सव के मौके पर 'हिन्दुस्थान समाचार' से खास बातचीत में सोनू ने अपने इस आध्यात्मिक सफर के साथ-साथ समाज सेवा और फिल्मों की दुनिया में अपने बदलते नजरिए पर भी खुलकर बात की।
संघर्ष के दिनों में लिया था बाप्पा को घर लाने का फैसला
सोनू सूद ने बताया कि जब वह पहली बार मुंबई पहुंचे थे, तब उनके सामने कई चुनौतियां थीं। उसी दौर में उन्होंने तय किया कि गणपति बाप्पा को अपने घर लाएंगे और उनके दिखाए रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे। सोनू के मुताबिक, तब से 26 साल बीत चुके हैं और हर वर्ष बाप्पा उनके घर आते हैं। वह इसे अपने जीवन की एक ऐसी परंपरा मानते हैं, जिसने उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। उनका कहना है कि उनकी प्रार्थना बस इतनी है कि जिंदगी भर वह बाप्पा के बताए रास्ते पर चलते रहें।
बाप्पा के आने से परिवार और करीब आता है
गणपति उत्सव के दौरान घर के माहौल को लेकर सोनू ने कहा कि बाप्पा का आगमन अपने साथ खुशियां ही नहीं, बल्कि अपनों को करीब लाने का अवसर भी लेकर आता है। उनके घर पर परिवार के साथ दोस्त और करीबी लोग भी एकत्र होते हैं। सोनू के अनुसार, आज की व्यस्त जिंदगी में लोगों का एक साथ आना अपने आप में खास है। गणपति उत्सव उनके लिए ऐसा मौका है, जब रिश्तों की गर्माहट और अपनापन फिर से महसूस होता है।
26 साल में बदली जिंदगी, बाप्पा ने दिखाई नई राह
अपने 26 साल के सफर को याद करते हुए सोनू ने कहा कि मुंबई आने के समय उन्हें कोई नहीं जानता था और वह अपनी पहचान बनाने के लिए इस शहर में आए थे। उनके मुताबिक, इन वर्षों में जिंदगी ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया और बाप्पा लगातार उनका मार्गदर्शन करते रहे। सोनू गणपति को विघ्नहर्ता के साथ-साथ इंसान को दूसरों के लिए उपयोगी बनने की प्रेरणा देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि जरूरतमंदों की मदद कर पाना और किसी के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना ही बाप्पा के आशीर्वाद का सबसे खूबसूरत रूप है।
समाज सेवा को भी बाप्पा की सीख से जोड़ते हैं सोनू
सोनू सूद ने कहा कि उनके लिए समाज सेवा और लोगों की मदद करना केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं है। वह इसे गणपति बाप्पा से मिली सीख का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि अगर किसी इंसान के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति की परेशानी कम हो सकती है, तो इससे बड़ी बात कुछ नहीं हो सकती। लोगों की मदद करने में उन्हें जो संतोष मिलता है, वह उनके लिए बाप्पा के प्रति आस्था से भी जुड़ा हुआ है।
निर्देशन में अपने अनुभवों को कहानी का रूप देना चाहते हैं
फिल्मों और निर्देशन के नए सफर को लेकर सोनू ने कहा कि वह खुद को किसी एक तरह के सिनेमा तक सीमित नहीं रखना चाहते। अपने अब तक के काम के दौरान उन्हें दर्शकों से मिली प्रतिक्रियाओं से काफी कुछ सीखने को मिला है। बतौर निर्देशक वह इन्हीं अनुभवों और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं से मिली सीख को अपनी आने वाली फिल्मों में इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनका उद्देश्य ऐसी कहानियां पेश करना है, जिनमें उनकी अपनी रचनात्मक सोच दिखाई दे।
'फतेह' के बाद 'नंदी' पर कर रहे हैं काम
सोनू ने बताया कि उन्होंने 'फतेह' पर काफी मेहनत की थी और अब 'नंदी' नामक फिल्म पर काम कर रहे हैं। उन्होंने इस फिल्म की पटकथा तैयार करने में करीब 16 महीने लगाए हैं। इस दौरान उन्होंने लेखन से लेकर निर्देशन और ध्वनि निर्माण तक फिल्म बनाने की अलग-अलग प्रक्रियाओं को समझने की कोशिश की। सोनू के मुताबिक, वह लगातार एक रचनात्मक व्यक्ति के तौर पर खुद को आगे बढ़ाना चाहते हैं और निर्देशन के माध्यम से अलग-अलग तरह की कहानियों को अपनी शैली में दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / लोकेश चंद्र दुबे