हनुमानजी को हुई देर तो श्रीराम ने रेत से बना दिया शिवलिंग, ‘रामेश्वर महादेव’ के नाम से हुए विख्यात

काशी की प्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा के पांच प्रमुख पड़ावों में रामेश्वर महादेव का विशेष स्थान है। यह यात्रा का तीसरा विश्राम स्थल है, जहां भगवान श्रीराम और महादेव से जुड़ी एक प्राचीन लोकमान्यता आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि लंका विजय के बाद काशी पहुंचे भगवान श्रीराम ने वरुणा नदी की एक मुट्ठी रेत से स्वयं शिवलिंग बनाकर यहां स्थापित किया था। तभी से बाबा यहां रामेश्वर महादेव के रूप में पूजे जाते हैं।
 

वाराणसी। काशी की प्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा के पांच प्रमुख पड़ावों में रामेश्वर महादेव का विशेष स्थान है। यह यात्रा का तीसरा विश्राम स्थल है, जहां भगवान श्रीराम और महादेव से जुड़ी एक प्राचीन लोकमान्यता आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि लंका विजय के बाद काशी पहुंचे भगवान श्रीराम ने वरुणा नदी की एक मुट्ठी रेत से स्वयं शिवलिंग बनाकर यहां स्थापित किया था। तभी से बाबा यहां रामेश्वर महादेव के रूप में पूजे जाते हैं।

लंका विजय के बाद श्रीराम ने की थी पंचक्रोशी यात्रा
लोकमान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने लंका में रावण का वध किया। रावण ब्राह्मण कुल से था, इसलिए उसके वध से लगे ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए भगवान श्रीराम ने काशी में पंचक्रोशी यात्रा की। यात्रा करते हुए भगवान श्रीराम वरुणा नदी के तट पर पहुंचे। यहां उन्होंने रात्रि विश्राम किया। पंचक्रोशी यात्रा की परंपरा में आज भी रामेश्वर को तीसरा प्रमुख पड़ाव माना जाता है और यहां यात्रियों के रात्रि विश्राम की परंपरा चली आ रही है।

हनुमानजी को शिवलिंग लाने में हुआ विलंब
मान्यता है कि अगले दिन भगवान श्रीराम ने पूजा-अर्चना की तैयारी की तो उनके मन में इस पवित्र स्थान पर अपने आराध्य भगवान शिव की स्थापना का विचार आया। शिवलिंग लाने का दायित्व हनुमानजी को दिया गया, लेकिन उन्हें लौटने में विलंब हो गया। पूजा का समय निकलता देख भगवान श्रीराम ने वरुणा नदी के तट से एक मुट्ठी रेत उठाई। उसी रेत से अपने हाथों से शिवलिंग बनाया और विधि-विधान से उसकी स्थापना कर पूजा की। भगवान राम द्वारा स्थापित किए जाने की मान्यता के कारण शिवलिंग ‘रामेश्वर महादेव’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पुराण में स्पष्ट उल्लेख नहीं, लोकपरंपरा में जीवित है कथा
मंदिर के प्रधान पुजारी आचार्य पं. अनूप तिवारी के अनुसार भगवान श्रीराम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की यह कथा स्थानीय धार्मिक परंपरा और मान्यताओं में लंबे समय से चली आ रही है। हालांकि स्कंदपुराण के काशी खंड में भगवान श्रीराम द्वारा यहां शिवलिंग स्थापित किए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसके बावजूद रामेश्वर महादेव को लेकर श्रद्धालुओं की आस्था पीढ़ियों से कायम है। पंचक्रोशी यात्रा करने वाले श्रद्धालु बाबा रामेश्वर के दर्शन-पूजन को अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

सावन में उमड़ते हैं श्रद्धालु, लगता है लोटा-भंटा मेला
सावन के महीने में रामेश्वर महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ होती है। बाबा का जलाभिषेक और दर्शन-पूजन करने के लिए दूर-दूर से भक्त यहां पहुंचते हैं। रामेश्वर क्षेत्र का प्रसिद्ध लोटा-भंटा मेला भी यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है।

श्रीराम और महादेव के मिलन की आस्था का केंद्र
रामेश्वर महादेव मंदिर केवल पंचक्रोशी यात्रा का विश्राम स्थल ही नहीं, बल्कि काशी में राम और शिव की परंपराओं के संगम का भी प्रतीक है। एक ओर भगवान श्रीराम के हाथों शिवलिंग की स्थापना की लोकमान्यता है, तो दूसरी ओर सदियों से चली आ रही पंचक्रोशी यात्रा इस स्थान की धार्मिक महत्ता को जीवंत बनाए हुए है। आज भी पंचक्रोशी यात्री जब रामेश्वर पहुंचकर बाबा का दर्शन करते हैं तो भगवान राम द्वारा महादेव की आराधना की इस प्राचीन कथा को याद करते हैं। यही आस्था रामेश्वर महादेव को काशी की पंचक्रोशी यात्रा के सबसे पावन पड़ावों में शामिल करती है।