समुद्र जो पहाड़ बन गया, जीव जो भगवान बन गया : शालिग्राम, अमोनोइट और मुक्तिनाथ की वह कहानी जो करोड़ों साल पुरानी है

हिमालय की ऊंचाइयों पर बसी मुक्तिनाथ की घाटी को देखकर शायद ही कोई कल्पना कर सके कि करोड़ों वर्ष पहले यहां पहाड़ नहीं, समुद्र था। आज जहां बर्फीली चोटियां आसमान से बातें करती हैं, कभी वहां अथाह जलराशि फैली थी। उसी प्राचीन समुद्र में विचरने वाले जीवों के अवशेष आज काली गंडकी के तट पर काले, चक्रयुक्त पत्थरों के रूप में मिलते हैं।
 

फीचर डेस्क, Live VNS

नेपाल में हिमालय की ऊंचाइयों पर बसी मुक्तिनाथ की घाटी को देखकर शायद ही कोई कल्पना कर सके कि करोड़ों वर्ष पहले यहां पहाड़ नहीं, समुद्र था। आज जहां बर्फीली चोटियां आसमान से बातें करती हैं, कभी वहां अथाह जलराशि फैली थी। उसी प्राचीन समुद्र में विचरने वाले जीवों के अवशेष आज काली गंडकी के तट पर काले, चक्रयुक्त पत्थरों के रूप में मिलते हैं।

सनातन परंपरा इन्हें शालिग्राम कहती है और भगवान विष्णु का स्वयंभू स्वरूप मानकर पूजती है। भूविज्ञान इन्हीं शिलाओं में पाए जाने वाले सर्पिल जीवाश्मों को प्राचीन समुद्री जीव अमोनाइट से जोड़कर देखता है।

यहीं से शुरू होती है शालिग्राम की वह विलक्षण कहानी, जहां एक ही पत्थर को आस्था श्रीहरि के रूप में प्रणाम करती है और विज्ञान उसमें पृथ्वी के करोड़ों वर्ष पुराने इतिहास को पढ़ता है।

हिमालय की गोद में आखिर समुद्री जीव कैसे पहुंचा?

नेपाल के मुस्तांग (मस्टांग) क्षेत्र में स्थित मुक्तिनाथ समुद्र तल से लगभग 3,700 मीटर की ऊंचाई पर है। इसके नीचे बहती काली गंडकी नदी और आसपास का हिमालयी भूभाग प्राचीन भूगर्भीय इतिहास की परतें समेटे हुए है।

यह कहानी उस समय की है जब आज का हिमालय अस्तित्व में ही नहीं था। भारतीय भूभाग और यूरेशियाई भूभाग के बीच विशाल टेथिस महासागर फैला था। इसी समुद्री क्षेत्र की तलछटी चट्टानों में अनेक समुद्री जीवों के अवशेष संरक्षित होते गए।

समय बदला। भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ी और यूरेशियाई प्लेट से टकराई। दोनों भूखंडों के बीच मौजूद समुद्री तलछट दबाव से मुड़ी, ऊपर उठी और करोड़ों वर्षों की भूगर्भीय प्रक्रिया ने हिमालय को जन्म दिया।

यानी जिन चट्टानों के ऊपर कभी समुद्र की लहरें थीं, वे आज दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं।

करोड़ों वर्ष पहले समुद्र में तैरता था अमोनाइट

अमोनाइट समुद्र में रहने वाले जीवों का एक विलुप्त समूह था। इनके शरीर के बाहर एक कठोर और सामान्यतः सर्पिल खोल होता था। इनका संबंध सेफेलोपोड समूह से था, जिसमें आज के ऑक्टोपस, स्क्विड और नॉटिलस जैसे जीव शामिल हैं।

इनका इतिहास करोड़ों वर्षों में फैला है। विशेष रूप से मेसोजोइक युग में ये समुद्रों में व्यापक रूप से पाए जाते थे। लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले, डायनासोरों के साथ अमोनाइट भी विलुप्त हो गए।

लेकिन उनकी कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई।

मृत अमोनाइट के खोल समुद्र तल की गाद में दबते गए। धीरे-धीरे तलछट की परतें उनके ऊपर जमती रहीं। लंबे समय में खनिजों और भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने उनके अवशेषों को जीवाश्म में बदल दिया। जिस जीव का शरीर नष्ट हो चुका था, उसकी आकृति पत्थर में दर्ज रह गई।

करोड़ों वर्ष बाद जब वही समुद्री तल हिमालय बनकर ऊपर उठा, तो उसके भीतर बंद जीवाश्म भी पहाड़ों की ऊंचाइयों तक पहुंच गए।

काली गंडकी खोलती है धरती की करोड़ों साल पुरानी किताब

हिमालय का निर्माण समाप्त हो चुकी घटना नहीं है। यह क्षेत्र आज भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय है। दूसरी ओर नदियां लगातार पहाड़ों को काट रही हैं और उनकी प्राचीन चट्टानों को उजागर कर रही हैं।

काली गंडकी भी यही करती है।

पहाड़ों के बीच अपना रास्ता बनाती नदी प्राचीन तलछटी चट्टानों का अपरदन करती है। इन्हीं चट्टानों से जीवाश्मयुक्त काली शिलाएं बाहर निकलकर नदी और उसके तटों तक पहुंचती हैं।

इस तरह हाथ में आया एक छोटा-सा शालिग्राम केवल पत्थर नहीं रह जाता। उसकी कहानी उस समय तक पहुंचती है जब हिमालय की जगह समुद्र था।

विज्ञान का जीवाश्म, आस्था के श्रीहरि

भूविज्ञान जहां इन संरचनाओं में अमोनाइट जीवाश्म देखता है, वहीं वैष्णव परंपरा में शालिग्राम की पहचान बिल्कुल अलग और अत्यंत पवित्र है।

शालिग्राम को किसी मनुष्य द्वारा तराशकर बनाई गई प्रतिमा नहीं माना जाता। वह स्वयंभू है। यानी प्रकृति में जिस स्वरूप में प्राप्त हुआ, उसी स्वरूप में भगवान विष्णु का विग्रह माना जाता है।

उसके भीतर दिखाई देने वाली चक्राकार संरचनाएं वैष्णव आस्था में भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से जोड़ी जाती हैं। श्याम वर्ण की शिला नारायण के स्वरूप का प्रतीक बनती है और गंडकी नदी स्वयं पवित्र मानी जाती है।

यही इसकी सबसे अनूठी विशेषता है—मनुष्य ने इसमें भगवान की आकृति उकेरी नहीं। प्रकृति से प्राप्त स्वरूप को ही दिव्यता का आधार माना गया।

मुक्तिनाथ: जहां मोक्ष की कामना लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु

इसी काली गंडकी क्षेत्र में स्थित मुक्तिनाथ सनातन और बौद्ध, दोनों परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ है।

हिंदू श्रद्धालुओं के लिए यह भगवान विष्णु से जुड़ा प्रमुख मोक्ष क्षेत्र है। वैष्णव परंपरा में इसे विशेष स्थान प्राप्त है। वहीं तिब्बती बौद्ध परंपरा में भी मुक्तिनाथ का अपना आध्यात्मिक महत्व है।

ऊंचे, निर्जन और कठोर हिमालयी भूभाग के बीच स्थित यह तीर्थ अपने आप में एक असाधारण दृश्य प्रस्तुत करता है। नीचे वही धरती है जिसमें प्राचीन समुद्र के जीवाश्म छिपे हैं और ऊपर वह धाम, जहां मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति की कामना लेकर पहुंचता है।

भूगर्भ और अध्यात्म का ऐसा संयोग दुर्लभ है।

‘शेष’ की कल्पना और जीवाश्म का अद्भुत प्रतीक

भारतीय दर्शन में भगवान विष्णु का एक अत्यंत प्रसिद्ध स्वरूप है- शेषशायी नारायण। क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते विष्णु।

‘शेष’ शब्द अपने भीतर एक गहरा दार्शनिक अर्थ रखता है- वह जो अंत के बाद भी बचा रहे।

इसी बिंदु पर शालिग्राम का वैज्ञानिक स्वरूप एक सुंदर दार्शनिक प्रतीक बन जाता है। जिस अमोनाइट का जीवित अस्तित्व करोड़ों वर्ष पहले समाप्त हो गया, उसका चिह्न आज भी मौजूद है। शरीर नहीं रहा, समुद्र नहीं रहा, भूगोल बदल गया- लेकिन पत्थर में अंकित उसका स्वरूप बचा रहा।

यह वैज्ञानिक तथ्य और धार्मिक अवधारणा की समानता का प्रमाण नहीं, लेकिन दोनों को साथ रखकर देखने पर एक प्रभावशाली दार्शनिक बिंब जरूर उभरता है- समय सब कुछ बदल देता है, फिर भी कुछ निशान शेष रह जाते हैं।

शालिग्राम का चक्र इतना आकर्षित क्यों करता है?

अमोनाइट जीवाश्म की सबसे पहचानने योग्य विशेषताओं में उसका सर्पिल स्वरूप है। खोल बढ़ने के साथ उसमें नए कक्ष बनते जाते थे और पूरा ढांचा एक व्यवस्थित घुमाव लेता था।

सर्पिल आकृतियां प्रकृति में अनेक जगह दिखाई देती हैं- कुछ सीपियों और जीवों के खोल से लेकर पौधों की संरचनाओं और बड़े खगोलीय पिंडों के कुछ रूपों तक। हालांकि इन सभी संरचनाओं के पीछे एक ही भौतिक प्रक्रिया नहीं होती।

फिर भी मनुष्य को सर्पिल आकृति हमेशा आकर्षित करती रही है। उसमें विस्तार भी है, गति भी और केंद्र से बाहर की ओर बढ़ती निरंतरता भी।

शालिग्राम में दिखाई देने वाला यही प्राकृतिक चक्र वैष्णव परंपरा में सुदर्शन से जुड़कर एक अलग आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण कर लेता है।

आस्था और विज्ञान विरोधी नहीं, दो अलग प्रश्नों के उत्तर हैं

शालिग्राम को समझने का सबसे रोचक तरीका शायद विज्ञान और धर्म को एक-दूसरे का विकल्प बनाने के बजाय उनके प्रश्नों को अलग-अलग समझना है।

विज्ञान पूछता है- यह पत्थर बना कैसे? इसमें यह जीवाश्म आया कहां से? समुद्री जीव हिमालय तक कैसे पहुंचा?

भूविज्ञान इसका उत्तर प्लेट टेक्टोनिक्स, प्राचीन टेथिस महासागर, तलछटी चट्टानों, जीवाश्मीकरण और अपरदन में खोजता है।

आस्था का प्रश्न अलग है- मनुष्य इस प्राकृतिक संरचना में दिव्यता क्यों देखता है? वह इसे विष्णु का स्वरूप क्यों मानता है?

इसका उत्तर हजारों वर्षों में विकसित धार्मिक परंपराओं, पुराण कथाओं, प्रतीकों और मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना में मिलता है।

एक ही शिला के सामने खड़े होकर दोनों दृष्टियां अलग-अलग दिशाओं में देखती हैं, लेकिन दोनों में विस्मय का तत्व समान है।

हाथ में पत्थर नहीं, पृथ्वी के इतिहास का एक पन्ना

कल्पना कीजिए।

जिस शिला को आज कोई श्रद्धालु अपनी हथेली पर रखकर भगवान विष्णु के रूप में पूज रहा है, उसके भीतर दर्ज संरचना की कहानी उस दौर से जुड़ी हो सकती है जब मनुष्य तो दूर, हिमालय भी आज के स्वरूप में मौजूद नहीं था।

वह समुद्र के भीतर एक जीव था। जीव मर गया। उसका खोल तलछट में दब गया। समुद्र सिकुड़ता गया। महाद्वीप टकराए। चट्टानें मुड़ीं। हिमालय उठा। बारिश हुई। बर्फ जमी। नदियां बनीं। चट्टानें टूटीं और अंततः वही जीवाश्म काली गंडकी की धारा तक पहुंचा।

फिर एक दिन किसी मनुष्य ने उसे उठाया।

विज्ञान ने उसमें पृथ्वी का इतिहास देखा।

आस्था ने उसमें नारायण देखे।

समुद्र मिट गया, लेकिन उसकी स्मृति पत्थर में बची रही

शालिग्राम की सबसे बड़ी खूबसूरती शायद इसी में है कि उसे समझने के लिए चमत्कार गढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसकी वास्तविक कहानी ही पर्याप्त अद्भुत है।

जिस स्थान पर आज हिमालय खड़ा है, वहां कभी समुद्र था। जिस जीव की प्रजाति करोड़ों वर्ष पहले विलुप्त हो गई, उसकी आकृति आज भी चट्टानों में सुरक्षित है। जिस समुद्री तल पर कभी अमोनाइट विचरते थे, वही भूभाग आज देवभूमि की ऊंचाइयों में बदल चुका है।

धरती बदल गई। समुद्र पीछे हट गया। प्रजातियां आईं और विलुप्त हो गईं। पहाड़ उठे और नदियों ने उन्हें काटना शुरू कर दिया।

लेकिन एक सर्पिल आकृति बची रही।

विज्ञान के लिए वह जीवाश्म है।
आस्था के लिए वह शालिग्राम है।
और समय की दृष्टि से देखें तो वह पृथ्वी की स्मृति है।

समुद्र पहाड़ बन गया। जीव पत्थर में बदल गया। और करोड़ों वर्षों की पूरी यात्रा एक छोटे से शालिग्राम में सिमट गई।