सावन के तीसरे सोमवार पर शुभ योग का संयोग, जानें कब तक रहेगी पंचमी तिथि और कैसे करें भोलेनाथ की पूजा

वाराणसी। भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माने जाने वाले श्रावण मास का तीसरा सोमवार 17 अगस्त को पड़ रहा है। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं में श्रावण सोमवार का विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिषविद् विमल जैन के अनुसार इस बार तीसरे सोमवार पर शुभ योग का संयोग बन रहा है। सोमवार और शुभ योग का यह संयोग भगवान आशुतोष के दर्शन-पूजन, व्रत और आराधना के लिए विशेष फलदायी माना गया है। मान्यता है कि विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से सुख-समृद्धि, सौभाग्य और खुशहाली की प्राप्ति होती है। श्रावण सोमवार के व्रत को शिवपुराण में वर्णित प्रमुख व्रतों में भी माना गया है।
 

वाराणसी। भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माने जाने वाले श्रावण मास का तीसरा सोमवार 17 अगस्त को पड़ रहा है। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं में श्रावण सोमवार का विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिषविद् विमल जैन के अनुसार इस बार तीसरे सोमवार पर शुभ योग का संयोग बन रहा है। सोमवार और शुभ योग का यह संयोग भगवान आशुतोष के दर्शन-पूजन, व्रत और आराधना के लिए विशेष फलदायी माना गया है। मान्यता है कि विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से सुख-समृद्धि, सौभाग्य और खुशहाली की प्राप्ति होती है। श्रावण सोमवार के व्रत को शिवपुराण में वर्णित प्रमुख व्रतों में भी माना गया है।

शाम 5:01 बजे तक रहेगी पंचमी तिथि
ज्योतिषविद् विमल जैन के अनुसार श्रावण मास का तीसरा सोमवार 17 अगस्त को है। इस दिन पंचमी तिथि शाम 5 बजकर 01 मिनट तक रहेगी, जिसके बाद षष्ठी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। चित्रा नक्षत्र 16 अगस्त की मध्यरात्रि के बाद 3 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 17 अगस्त की मध्यरात्रि के बाद 4 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। वहीं शुभ योग 16 अगस्त की मध्यरात्रि के बाद 4 बजकर 08 मिनट से शुरू होकर 17 अगस्त की मध्यरात्रि के बाद 3 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार सोमवार के साथ शुभ योग का यह संयोग भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए विशेष माना गया है।

श्रावण में पार्थिव शिवलिंग पूजन का विशेष महत्व
श्रावण मास में भगवान शिव को जल अर्पित करने की परंपरा है। शिवभक्त कांवड़ यात्रा कर पवित्र जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। इसके साथ ही इस माह में पार्थिव शिवलिंग की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वच्छ मिट्टी और गंगाजल से पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधि-विधान से उसकी पूजा-अर्चना की जाती है।

ऐसे करें श्रावण सोमवार का व्रत और पूजन
ज्योतिषविद् विमल जैन के अनुसार श्रावण सोमवार का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को प्रातः सूर्योदय से पहले ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने आराध्य देवी-देवता का पूजन करना चाहिए। इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण कर दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध और कुश लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

व्रत करने वाले श्रद्धालु दिनभर निराहार रहने के बाद शाम को पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके भगवान शिव का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। भगवान शिव का अभिषेक करने के बाद उन्हें वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण और सुगंधित द्रव्य के साथ बेलपत्र, कनेर, धतूरा, मदार और ऋतु पुष्प आदि अर्पित करने का विधान बताया गया है। इसके बाद धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान की आरती करनी चाहिए। पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार विधि से पूजन के साथ माता पार्वती की पूजा का भी विधान है।

शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र सहित करें पाठ-जप
भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए श्रावण सोमवार को धार्मिक ग्रंथों और स्तोत्रों के पाठ का भी महत्व बताया गया है। ज्योतिषविद् के अनुसार श्रद्धालु सोमवार व्रत कथा, श्री शिव चालीसा, शिव स्तुति, शिव सहस्रनाम, शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र, शिव महिम्न स्तोत्र, शिव तांडव स्तोत्र, रुद्राष्टक और शिवपुराण का पाठ कर सकते हैं। इसके साथ भगवान शिव से संबंधित मंत्रों का जप और व्रत से जुड़ी कथाओं का श्रवण करना भी फलदायी माना गया है।

व्रत के दौरान दिनचर्या को नियमित और संयमित रखने की बात कही गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धालुओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए। गरीबों और असहायों की सेवा तथा सहायता को भी व्रत और आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। मान्यता है कि सेवा, दान और श्रद्धापूर्वक शिव आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होता है।

अलग-अलग वस्तुओं से शिवलिंग निर्माण की भी मान्यता
धार्मिक मान्यताओं में विभिन्न वस्तुओं से शिवलिंग बनाकर पूजा करने के अलग-अलग फल बताए गए हैं। चंदन और कस्तूरी से बने शिवलिंग की पूजा को भौतिक ऐश्वर्य-सुख, चांदी-सोना-मोती से बने शिवलिंग को खुशहाली व सौभाग्य वृद्धि तथा अक्षत, गेहूं और जौ के आटे से बने शिवलिंग की पूजा को सुख-शांति और संतान से जोड़ा गया है। स्फटिक के शिवलिंग की पूजा मनोकामना पूर्ति और दही से निर्मित शिवलिंग की पूजा धन-कामना की पूर्ति के लिए बताई गई है।

इसी प्रकार पीपल की लकड़ी, लहसुनिया रत्न, भस्म, फूल, दूर्वा और मिश्री अथवा शक्कर से शिवलिंग बनाकर पूजन की अलग-अलग मान्यताएं बताई गई हैं। इनमें दुःख-दरिद्रता से मुक्ति, शत्रुओं पर विजय, मनोकामना सिद्धि, भूमि-संपत्ति, अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और रोगों से मुक्ति जैसी कामनाएं शामिल हैं।

इस तरह 17 अगस्त को श्रावण के तीसरे सोमवार पर शुभ योग का संयोग शिवभक्तों के लिए विशेष माना जा रहा है। श्रद्धालु व्रत, अभिषेक, मंत्र-जप, स्तोत्र पाठ, दान और सेवा के माध्यम से भगवान आशुतोष की आराधना करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से की गई शिव आराधना जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली प्रदान करती है।