काशी में दिव्य उपस्थिति: अगस्त्य ऋषि की तपभूमि पर पत्नी लोपामुद्रा सहित विराजमान हैं अगस्त्येश्वर महादेव
वाराणसी। काशी की गलियों में भगवान शिव के मंदिरों के साथ ऋषि-मुनियों की तपस्या से जुड़े अनेक पौराणिक स्थल मौजूद हैं। ऐसा ही एक प्राचीन स्थान गोदौलिया के निकट अगस्तकुंड मोहल्ले में स्थित अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर और अगस्त्य तीर्थ है। मान्यता है कि इसी स्थान पर महर्षि अगस्त्य ने कठोर तपस्या की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और अगस्त्येश्वर महादेव के रूप में यहां विराजमान हुए।
अगस्त्य ऋषि की तपस्या से प्रसन्न हुए थे महादेव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि अगस्त्य ने काशी में इसी स्थान को अपनी तपोभूमि बनाया था। उन्होंने यहां भगवान शिव की घोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए और उन्हें दर्शन दिया। इसके बाद भगवान शिव यहां अगस्त्येश्वर महादेव के रूप में प्रतिष्ठित हुए। मंदिर में महर्षि अगस्त्य और उनकी धर्मपत्नी माता लोपामुद्रा की भी विशेष मान्यता है। परिसर में दोनों की प्रतिमाओं के साथ भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
स्कंदपुराण के काशी खंड में अगस्त्य तीर्थ की महिमा
अगस्त्य तीर्थ की महिमा का वर्णन स्कंदपुराण के काशी खंड में भी मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अगस्त्य तीर्थ में स्नान, अगस्त्येश्वर महादेव के दर्शन और अगस्त कुंड में पितरों का तर्पण विशेष फलदायी माना गया है। मान्यता है कि यहां महर्षि अगस्त्य और माता लोपामुद्रा को नमन करने से मनुष्य के पाप और क्लेश दूर होते हैं। इस तीर्थ को पितरों से भी जोड़कर देखा जाता है और यहां विधि-विधान से तर्पण करने का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।
काशी छोड़ने से पहले बाबा विश्वनाथ से मांगी थी अनुमति
महर्षि अगस्त्य से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा विंध्य पर्वत की भी है। कथा के अनुसार पृथ्वी का संतुलन बनाए रखने और विंध्य पर्वत के बढ़ते अहंकार को शांत करने के लिए महर्षि अगस्त्य को दक्षिण दिशा की ओर जाना पड़ा। काशी से प्रस्थान करने से पहले उन्होंने वृद्धिरज गणेश, कालभैरव, बाबा विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा से अनुमति मांगी। इसके बाद वे दक्षिण की ओर रवाना हुए। मार्ग में जब उनका सामना विंध्य पर्वत से हुआ तो वह महर्षि अगस्त्य के सामने नतमस्तक हो गया।
कथा के अनुसार अगस्त्य ऋषि ने विंध्य से कहा कि वह इसी अवस्था में तब तक रहे, जब तक वे दक्षिण से वापस न लौट आएं। महर्षि अगस्त्य फिर दक्षिण में ही रहे और विंध्य उनके आदेश का पालन करता रहा। यह कथा भारतीय पौराणिक परंपरा में महर्षि अगस्त्य के तपोबल और प्रभाव को दर्शाती है।
दर्शन से सौभाग्य मिलने की मान्यता
अगस्त्येश्वर महादेव को लेकर काशी के श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। भक्तों का विश्वास है कि बाबा के दर्शन और विधि-विधान से पूजन करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गोदौलिया जैसे व्यस्त इलाके के करीब स्थित होने के बावजूद अगस्तकुंड की पहचान आज भी अपनी प्राचीन धार्मिक विरासत से जुड़ी हुई है। अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर काशी की उस परंपरा का साक्षी है, जहां ऋषियों की तपस्या, पौराणिक कथाएं और भगवान शिव की आराधना एक-दूसरे में समाहित दिखाई देती हैं।