Holika Dahan 2026: हरदोई का 5000 साल पुराना मंदिर और है प्रह्लाद कुंड... जहां भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु का किया था वध
हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन देशभर में रंगों के साथ होली खेली जाती है. इससे एक दिन पहले फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका दहन किया जाता है. इस साल 03 मार्च को फाल्गुन पुर्णिमा मनाई जाएगी. इसी दिन होलिका दहन होगा. इसके अगले दिन यानी 04 मार्च को इस साल रंगों का त्योहार मनाया जाता है. अब होली में ज्यादा दिन शेष नहीं रह गए हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि होलिका दहन और होली की शुरुआत हरदोई से हुई थी?
हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन देशभर में रंगों के साथ होली खेली जाती है. इससे एक दिन पहले फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका दहन किया जाता है. इस साल 03 मार्च को फाल्गुन पुर्णिमा मनाई जाएगी. इसी दिन होलिका दहन होगा. इसके अगले दिन यानी 04 मार्च को इस साल रंगों का त्योहार मनाया जाता है. अब होली में ज्यादा दिन शेष नहीं रह गए हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि होलिका दहन और होली की शुरुआत हरदोई से हुई थी?
उत्तर प्रदेश का हरदोई जिला पौराणिक रूप से दैत्यराज हिरण्यकशिपु की राजधानी माना जाता है, जहां से होलिका दहन और होली की परंपरा जुड़ी है. आज भी यहां वो जगह मौजूद है, जहां होलिका की गोद में प्रह्लाद बैठे थे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई थी. यहां भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु का टीले में तब्दील महल और भगवान नरसिंह अवतार सहित होलिका दहन के सबूत आज भी देखे जा सकते हैं.
5000 साल से भी पुराना नृसिंह भगवान मंदिर
हरदोई में करीब 5000 साल से भी पुराना नृसिंह भगवान का मंदिर है. यहां ‘प्रह्लाद घाट’ और हिरण्यकशिपु के महल का खंडहर आज भी देखा जा सकता है. हरदोई का पुराना नाम हरिद्रोही था. चूंकि हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था. मान्यताओं के अनुसार, यहां के ‘प्रह्लाद घाट’ पर ही हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने विष्णु भक्त प्रह्लाद को जलाने का प्रयास किया था, लेकिन वह स्वयं भस्म हो गई.
नरसिंह अवतार और हिरण्यकशिपु का वध
विष्णु भक्त प्रह्लाद के बच जाने और होलिका के जलने के बाद यहां लोगों ने राख उड़ाकर खुशी मनाई थी. होलिका दहन की घटना के बाद हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रह्लाद को सभा में बुलाकर खंभे में बांधकर मारने की कोशिश की थी, लेकिन तभी उसी खंभे को फाड़कर भगवान श्री हरि ने नरसिंह अवतार में ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखते हुए देहरी पर अपने पैरों पर डालकर नाखून से हिरण्यकश्यपु का वध कर दिया था.