पिठोरी अमावस्या कब है, 10 या 11 सितंबर? जानें सही तिथि और स्नान-दान का शुभ मुहूर्त

हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना जाता है. इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण, दान और धार्मिक कार्य करने की परंपरा है. भाद्रपद मास की अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है. इसे कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन कुशा एकत्र करने की परंपरा है, जिसका इस्तेमाल पूरे साल होने वाले कई धार्मिक कार्यों में किया जाता है. हालांकि, इस साल पिठोरी अमावस्या की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में आइए जानते हैं कि पिठोरी अमावस्या कब है, साथ ही जानेंगे स्नान-दान और पूजा का शुभ समय-

 

हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना जाता है. इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण, दान और धार्मिक कार्य करने की परंपरा है. भाद्रपद मास की अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है. इसे कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन कुशा एकत्र करने की परंपरा है, जिसका इस्तेमाल पूरे साल होने वाले कई धार्मिक कार्यों में किया जाता है. हालांकि, इस साल पिठोरी अमावस्या की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में आइए जानते हैं कि पिठोरी अमावस्या कब है, साथ ही जानेंगे स्नान-दान और पूजा का शुभ समय-

10 या 11 सितंबर, कब है पिठोरी अमावस्या?

पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 10 सितंबर की सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी. इसका समापन 11 सितंबर की सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा. ऐसे में उदया तिथि के आधार पर पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर को  मनाई जाएगी.

स्नान-दान और पूजा का शुभ समय
पिठोरी अमावस्या पर सुबह स्नान और दान करने का मुहूर्त 4 बजकर 31 मिनट से 5 बजकर 17 मिनट तक रहेगा.
वहीं, पूजा के लिए सुबह 6 बजकर 7 मिनट से 9 बजकर 18 मिनट तक का समय शुभ रहेगा.
पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए 10 सितंबर को दोपहर 11 बजकर 45 मिनट से 1 बजकर 30 मिनट तक का समय शुभ रहेगा.
संतान की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है व्रत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिठोरी अमावस्या पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं. अगर आप भी इस दिन व्रत रखने वाली हैं, तो -

सूर्योदय से पहले स्नान करके व्रत का संकल्प लें.
इसके बाद पूजा में चावल के आटे से 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं की प्रतीकात्मक मूर्ति बनाई जाती हैं.
इन्हें लाल कपड़े पर स्थापित करके गणेश पूजा की जाती है.
इसके बाद रोली, हल्दी, कुमकुम, दूर्वा, लाल फूल और सुहाग की सामग्री अर्पित करें.
इसके बाद आटे से बने पकवान और खीर-पूरी का भोग लगाएं.
कथा सुनें और आरती के बाद वरिष्ठ महिलाओं और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा दें.