Puri Jagannath Rath Yatra 2026: आज से शुरू हुआ जगन्नाथ जी का महाउत्सव, जानें रथयात्रा का धार्मिक महत्व
आज आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि है. आज का दिन ओडिशा के साथ-साथ पूरे देश के लिए बहुत खास है, क्योंकि आज से पुरी स्थित जगन्नाथ जी मंदिर में रथयात्रा का पावन महापर्व शुरू हो गया है. रथयात्रा का समापन 24 जुलाई को बहुदा यात्रा के साथ होगी. वहीं इस महापर्व का समापन 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे अनुष्ठान के साथ होगा. रथयात्रा के दौरान भगवान अपने बड़े भाई बलभद्र जी और बहन सुभद्रा देवी के साथ रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा देवी मंदिर जाते हैं.
आज आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि है. आज का दिन ओडिशा के साथ-साथ पूरे देश के लिए बहुत खास है, क्योंकि आज से पुरी स्थित जगन्नाथ जी मंदिर में रथयात्रा का पावन महापर्व शुरू हो गया है. रथयात्रा का समापन 24 जुलाई को बहुदा यात्रा के साथ होगी. वहीं इस महापर्व का समापन 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे अनुष्ठान के साथ होगा. रथयात्रा के दौरान भगवान अपने बड़े भाई बलभद्र जी और बहन सुभद्रा देवी के साथ रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा देवी मंदिर जाते हैं.
इस दौरान भगवान अपने भक्तों को मंदिर से बाहर आकर दर्शन देते हैं. रथयात्रा में शामिल लाखों श्रद्धालु इस दौरान भगवान के रथ की रस्सियां खींचते हैं, जिससे उनको पुण्य प्राप्त होता है और जन्मों के पापों का नाश हो जाता है. छत्तीस निजोग,अनुष्ठान उप-समिति और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) द्वारा तय शेड्यूल के अनुसार, आज शाम को 04 बजे रथों को खींचने का कार्यक्रम होगा. आज रवि योग भी बन रहा है, इसलिए इस रथयात्रा का महत्व और अधिक बढ़ गया है.
रथयात्रा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा जी के साथ अपनी मौसी के घर गुंडीचा (मंदिर) देवी के यहां जाया करते हैं. अपने मौसी के घर भगवान कुछ दिनों तक प्रवास और विश्राम करते हैं. इसके बाद दोबारा वो श्रीमंदिर लौटते हैं. रथयात्रा में हर वर्ग, जाति और समुदाय के लोग रथ को खींचते हैं.
सबसे पीछे चलता है जगन्नाथ जी का रथ
मान्यता है कि रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा में शामिल होकर उनके दर्शन और रस्सी खींचने से बहुत पुण्य मिलता है. जगन्नाथ रथयात्रा भगवान के प्रति भक्ति, अटूट विश्वास और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है. रथयात्रा के लिए नीम की लकड़ियों से तीन भव्य रथ बनाए जाते हैं. रथयात्रा में सबसे आगे बलराम जी का रथ ‘तालध्वज’ (लाल-हरा रंग), मध्य में सुभद्रा जी का रथ ‘दर्पदलन’ या ‘पद्मरथ’ (नीला-काला रंग) और पीछे जगन्नाथ जी का रथ ‘नंदिघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ (लाल-पीला रंग) चलता है.