Pitru Paksha 2026: पितृदोष क्या होता है और क्यों लगता है? कुंडली देखकर ऐसे करें पहचान… ये उपाय आएंगे काम!

 जीवन में लगातार आ रही रुकावटें, बनते कामों का बिगड़ जाना, बिना वजह धन हानि या घर में क्लेश इन सबके पीछे कई बार कुंडली में मौजूद पितृदोष बड़ा कारण होता है. द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में पितृपक्ष का आरंभ 26 सितंबर, शनिवार से होने जा रहा है. यह समय पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए उपाय करने का सबसे सही अवसर माना गया है. आइए जानते हैं, कि आखिर पितृदोष क्या होता है, यह कुंडली में यह कैसे बनता है, इसके लक्षण क्या हैं और पितृपक्ष के दौरान किन उपायों को करके इस दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

 

 जीवन में लगातार आ रही रुकावटें, बनते कामों का बिगड़ जाना, बिना वजह धन हानि या घर में क्लेश इन सबके पीछे कई बार कुंडली में मौजूद पितृदोष बड़ा कारण होता है. द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में पितृपक्ष का आरंभ 26 सितंबर, शनिवार से होने जा रहा है. यह समय पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए उपाय करने का सबसे सही अवसर माना गया है. आइए जानते हैं, कि आखिर पितृदोष क्या होता है, यह कुंडली में यह कैसे बनता है, इसके लक्षण क्या हैं और पितृपक्ष के दौरान किन उपायों को करके इस दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

पितृपक्ष में पितरों को याद करने का विशेष महत्व
हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान जाहिर करने का महत्वपूर्ण समय माना गया है. इस दौरान परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इन कर्मों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी. ऐसे में पितरों की शांति और उनसे जुड़े धार्मिक कर्मों को लेकर लोगों के बीच कई तरह की मान्यताएं रहती हैं. इन्हीं में से एक है पितृदोष.

क्या होता है पितृदोष?
ज्योतिष शास्त्र में पितृदोष को कुंडली में बनने वाला एक ऐसा दोष माना जाता है, जिसका संबंध पूर्वजों, पितरों और उनसे जुड़े कर्मों से जोड़ा जाता है. मान्यता के अनुसार, जब पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों में कमी रह जाती है या पितरों का श्राद्ध और तर्पण उचित तरीके से नहीं हो पाता, तो इसका प्रभाव पितृदोष के रूप में देखा जा सकता है.

कुंडली में पितृदोष की पहचान कैसे करें?
ज्योतिष के अनुसार, कुंडली में सूर्य को पिता, आत्मा और पूर्वजों से जुड़े विषयों का कारक माना जाता है. इसलिए सूर्य पर पड़ने वाले अशुभ प्रभावों को पितृदोष से जोड़कर देखा जाता है. आइए जानते हैं ऐसी प्रमुख ग्रह स्थितियां जिनका बारे में ज्योतिष में बताया गया है.

नवम भाव में सूर्य और राहु
कुंडली का नवम भाव धर्म, भाग्य, पिता, गुरु और पूर्वजों से संबंधित माना जाता है. ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, यदि नवम भाव में सूर्य और राहु एक साथ स्थित हों, तो इसे पितृदोष की एक स्थिति माना जाता है.

सूर्य पर राहु या केतु का प्रभाव
ज्योतिष में सूर्य और राहु की युति को ग्रहण योग से भी जोड़ा जाता है. इसी तरह सूर्य पर राहु या केतु की दृष्टि अथवा अन्य अशुभ प्रभावों को भी कुछ ज्योतिषीय मत पितृदोष से संबंधित मानते हैं. ऐसी ग्रह स्थिति होने पर कुंडली के दूसरे भाव, नवम भाव, सूर्य की स्थिति और संबंधित ग्रहों के बल को भी देखा जाता है.

सूर्य और शनि की युति
सूर्य और शनि दोनों का ज्योतिष में विशेष महत्व है. सूर्य को पिता और आत्मबल का कारक माना जाता है, जबकि शनि को कर्म, संघर्ष और दायित्वों से जोड़ा जाता है. ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, यदि कुंडली में सूर्य और शनि एक ही भाव में हों या दोनों के बीच प्रतिकूल संबंध हो, तो इसे भी पितृदोष से जोड़कर देखा जाता है.

पितृदोष की शांति के लिए क्या करें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष पितरों की शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण करने का विशेष समय माना जाता है. इस दौरान परिवार की परंपरा के अनुसार पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है. जरूरतमंदों या योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराना और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान करना भी पितृकर्म का हिस्सा माना जाता है. कई परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों की तिथि पर हर साल श्राद्ध कर्म करते हैं.