Ashadha Amavasya 2026: आषाढ़ अमावस्या आज, जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और पितरों के तर्पण की विधि

आज आषाढ़ माह की अमावस्या है. सनातन धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है. आषाढ़ माह की अमावस्या को आषाढ़ी अमावस्या भी कहते हैं. चूंकि, आज मंगवार का दिन और इस दिन पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहा जाता है, इसलिए आज की ये अमावस्या भौमवती अमावस्या भी है. ये तिथि पितरों को समर्पित की गई है. मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान और पितरों के निमित्त तर्पण या पिंडदान करने से कष्टों से छुटकारा मिलता है और पितृ दोष शांत होता है.

 

आज आषाढ़ माह की अमावस्या है. सनातन धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है. आषाढ़ माह की अमावस्या को आषाढ़ी अमावस्या भी कहते हैं. चूंकि, आज मंगवार का दिन और इस दिन पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहा जाता है, इसलिए आज की ये अमावस्या भौमवती अमावस्या भी है. ये तिथि पितरों को समर्पित की गई है. मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान और पितरों के निमित्त तर्पण या पिंडदान करने से कष्टों से छुटकारा मिलता है और पितृ दोष शांत होता है.

अमावस्या पर आज स्नान-दान ब्रह्म मुहूर्त में ही शुरू हो चुका है. आज ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-दान का शुभ मुहूर्त सुबह 04 बजकर 11 मिनट पर शुरू हुआ और ये 04 बजकर 52 मिनट तक रहा. हालांकि, अब भी अन्य मुहूर्तों आषाढ़ अमावस्या का स्नान-दान किया जा सकता है, तो आइए जानते हैं स्नान-दान के अन्य मुहूर्त और पितरों के तर्पण की विधि.


आषाढ़ अमावस्या 2026 स्नान-दान के अन्य मुहूर्त
आज सुबह 05 बजकर 32 मिनट से अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त शुरू हुआ है. ये मुहूर्त सुबह 08 बजकर 45 मिनट तक रहेगा. अगर आप ब्रह्म मुहूर्त में अमावस्या का स्नान-दान नहीं कर पाएं हैं, तो अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त कर सकते हैं. ये मुहूर्त पितरों के लिए भी तर्पण के लिए भी शुभ है. इसके अलावा कुतुप काल आज 11 बजकर 40 मिनट से लेकर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा. कुतुप काल तर्पण और पिंडदान करने के लिए दिन का सबसे उत्तम और पवित्र मुहूर्त माना जाता है.

पितरों का पूजन और तर्पण की विधि
आषाढ़ अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर पावन नदी में या घर के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें. इसके बाद तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें. इस दौरान ऊं सूर्याय नमः मंत्र का जाप करते रहें. फिर शुभ मुहूर्त में एक तांबे या कांसे के पात्र में साफ जल लें. जल में थोड़ा सा कच्चा दूध, जौ, तिल और कुशा डालें. इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके खड़े हों और अंगूठे से जल को अंजलि (हाथों) से गिराते हुए अपने पितरों का तर्पण करें.

पितरों की आत्मा की शांति के भोजन तैयार कराएं. भोजन में से गाय, कुत्ता, कौआ, देवादि और चींटियों के लिए हिस्सा निकालें. ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं. तर्पण के बाद किसी योग्य ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराएं और फिर अपनी क्षमता के अनुसार उनको तिल, अन्न, वस्त्र या जल से भरे पात्र का दान दें.