हाई वैल्यूएशन की मार: साल के 15 आईपीओ में रिटेल कोटा भी नहीं भरा

 




नई दिल्ली, 28 अक्टूबर (हि.स.)। किसी भी आईपीओ को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदार रिटेल इन्वेस्टर्स का ही होता है। रिटेल इन्वेस्टर्स के रुझान से बाजार में किसी भी आईपीओ और बाद में लिस्टिंग के वक्त शेयर की चाल प्रभावित होती है। हालांकि इस साल प्राइमरी मार्केट में ऐसे कम से कम 15 आईपीओ लॉन्च हुए, जिनसे रिटेल इन्वेस्टर्स ने दूरी बनाए रखी। ये आईपीओ क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (क्यूआईबी) के भरोसे ही पूरी तरह से सब्सक्राइब हो सके।

मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 में अभी तक 100 से अधिक कंपनियों ने अपने आईपीओ बाजार में उतारे, लेकिन इनमें से 15 इश्यू ऐसे रहे, जिन्हें रिटेल इन्वेस्टर्स का पूरा साथ नहीं मिल सका। रिटेल इन्वेस्टर्स की बेरुखी इस कदर रही कि आईपीओ में उनके लिए रिजर्व पोर्शन भी पूरी तरह से सब्सक्राइब नहीं हो सका।

आपको बता दें कि शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों में बड़ी संख्या ऐसे निवेशकों की भी है, जो प्राइमरी मार्केट के जरिये बाजार में पैसा लगाते हैं। मतलब ये निवेशक अलग अलग कंपिनियों के पब्लिक इश्यू (आईपीओ) में पैसा लगाते हैं और लिस्टिंग के साथ ही मुनाफा वसूली करके बाजार से बाहर हो जाते हैं। किसी भी आईपीओ की सफलता में ऐसे रिटेल इन्वेस्टर्स का काफी योगदान होता है। ऐसे निवेशक अगर किसी आईपीओ से मुंह मोड़ लें, तो आईपीओ की दुर्गति होना तय हो जाता है।

जानकारों का कहना है कि जिन कंपनियों के आईपीओ से रिटेल इन्वेस्टर दूरी बनाये रहे, उनमें से ज्यादातर कंपनियों द्वारा प्रति शेयर के एवज में मांगी गई रकम काफी अधिक थी। अधिक वैल्यूएशन और उन कंपनियों की डांवाडोल वित्तीय स्थिति या उनको लगातार हो रहे नुकसान के चलते आम निवेशकों ने इनमें पूंजी लगाना ठीक नहीं समझा।

प्राइम डेटाबेस द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, इस सूची में शामिल कंपनियों में से क्लीन मैक्स एंवायरो एनर्जी सॉल्यूशंस को खुदरा वर्ग में सबसे कमजोर प्रतिक्रिया मिली, जहां रिटेल इन्वेस्टर्स का हिस्सा सिर्फ सात प्रतिशत ही सब्सक्राइब हो सका। इसके बाद साई पैरेंटेरल्स और पावरिका के आईपीओ रहे, जिन्हें क्रमशः 12 प्रतिशत और 15 प्रतिशत ही रिटेल सब्सक्रिप्शन मिल पाया।

प्राइम डेटाबेस द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार कुछ कंपनियां ऐसी भी रहीं, जो क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (क्यूआईबी) के दम पर कुल मिलाकर तो अच्छी तरह से सब्सक्राइब हो गईं, लेकिन रिटेल इन्वेस्टर्स को आकर्षित नहीं कर सकीं। जैसे जुनिपर ग्रीन एनर्जी का इश्यू कुल 6.16 गुना भरा, लेकिन इसके रिटेल इन्वेस्टर्स के हिस्से में केवल 95 प्रतिशत ही आवेदन आए। इसी तरह इनोविजन में रिटेल कोटा 59 प्रतिशत और मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज में 93 प्रतिशत ही भर पाया।

धामी सिक्योरिटीज के वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत धानी के अनुसार रिटेल इन्वेस्टर्स के इस रुख के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि अब वे आईपीओ में पैसा लगाने कते मामले में बेहद सतर्क हो गए हैं। आम निवेशक अब केवल कंपनी का नाम देखकर पैसा नहीं लगाते, बल्कि वे इस बात की भी बारीकी से जांच कर रहे हैं कि कंपनी का मुनाफा असल में नकद पूंजी में बदल रहा है या नहीं। कंपनी की बैलेंस शीट पर कर्ज का बोझ कितना है और प्रमोटर्स का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है। इसके साथ ही, शेयर बाजार में पहले से लिस्टेड समान क्षेत्र की दूसरी कंपनियों के मुकाबले वैल्यूएशन की तुलना भी की जा रही है। ग्रे मार्केट में होने वाले उतार-चढ़ाव यानी जीएमपी का भी इस पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि कम या नकारात्मक जीएमपी वाले आईपीओ से रिटेल इन्वेस्टर तुरंत किनारा कर लेते हैं।

हालांकि, रिटेल इन्वेस्टर्स की बेरुखी के बावजूद ये सभी 15 आईपीओ क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (क्यूआईबी) के सब्सक्रिप्शन की वजह से सफलतापूर्वक बंद होने में कामयाब रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि म्यूचुअल फंड्स को सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के जरिए लगातार भारी मात्रा में निवेश मिल रहा है, जिसके कारण फंड मैनेजर्स के पास नकदी की कोई कमी नहीं है और उन्हें इस पैसे को कहीं न कहीं इन्वेस्ट करके रखना ही होता है। इसलिए क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स आईपीओ में पैसा लगाने से हिचकते नहीं हैं। हालांकि जानकारो का कहना है कि केवल बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स के हाई सब्सक्रिप्शन को देख कर ही रिटेल इन्वेस्टर्स को आईपीओ पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि बड़े निवेशकों की दिलचस्पी किसी शेयर के भविष्य में अच्छे प्रदर्शन की गारंटी ही नहीं होती है। इसके पीछे और भी कई वजहें होती हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक