विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली जारी, सितंबर के पहले तीन सप्ताह में बेचे 20,974 करोड़ के शेयर
नई दिल्ली, 20 सितंबर (हि.स.)। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) सितंबर के महीने में लगातार बिकवाल (सेलर) की भूमिका में बने हुए नजर आ रहे हैं। इसके पहले एफपीआई जुलाई और अगस्त में लगातार लिवाल (बायर) की भूमिका में बने रहे थे। दो महीने तक लगातार खरीदारी के बाद अब सितंबर के महीने में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से दूरी बनानी शुरू कर दी है। सितंबर के पहले तीन कारोबारी सप्ताह में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 20,974 करोड़ रुपये की निकासी कर ली है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) साल 2026 में ज्यादातर समय तक बिकवाल (सेलर) की भूमिका में बने रहे हैं। फरवरी, जुलाई और अगस्त के अलावा 2026 के शेष सभी महीनों में विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली करके घरेलू शेयर बाजार से अपना पैसा निकालते रहे हैं। खासकर, मार्च के महीने में विदेशी निवेशकों ने जोरदार बिकवाली की। इसके बाद जुलाई के पहले के लगातार तीन महीने यानी जून, मई और अप्रैल में भी एफपीआई घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली कर अपना पैसा निकालने में लगे हुए थे।
जुलाई के महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने बिकवाली की तुलना में लिवाली अधिक की। इस महीने के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 20,199 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया। इसी तरह अगस्त के महीने में भी विदेशी निवेशकों की लिवाली का आंकड़ा बिकवाली के आंकड़े से अधिक का रहा। इस महीने के दौरान एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार में 30,919 करोड़ रुपये का निवेश किया। साल 2026 में जुलाई और अगस्त में हुई खरीदारी के पहले सिर्फ फरवरी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक खरीदार की भूमिका में नजर आए थे। फरवरी में एफपीआई ने कुल 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था।
अगर साल 2026 की शुरुआत से ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लिवाली और बिकवाली की बात करें तो सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (सीएसडीएल) के आंकड़ों के अनुसार जनवरी के महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने घरेलू शेयर बाजार में 35,962 करोड़ रुपये की बिकवाली की थी। फरवरी में एफपीआई ने बिकवाली की जगह लिवाली पर जोर दिया। इस महीने इन्होंने भारतीय शेयर बाजार में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया।
मार्च में एक बार फिर स्थिति बदल गई। इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने स्टॉक मार्केट में लगातार चौतरफा बिकवाली कर रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये की निकासी की। अप्रैल में भी एफपीआई की ओर से हो रही बिकवाली का सिलसिला जारी रहा। इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 60,847 करोड़ रुपये के शेयर बेच डाले। इसके बाद मई के महीने में भी एफपीआई ने स्टॉक मार्केट में 32,963 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए।
जून में भी एफपीआई ने घरेलू शेयर बाजार से 49,340 करोड़ रुपये की निकासी की। इसके बाद जुलाई में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 20,199 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया, जबकि अगस्त में एफपीआई ने घरेलू शेयर बाजार में 30,919 करोड़ रुपये डाले। इसके बाद सितंबर के महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाजार में लगातार बिकवाली करना शुरू कर दिया है, जिसके कारण इस महीने उनकी बिकवाली का आंकड़ा 20,974 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया है।
इन आंकड़ों से साफ है कि 2026 में जनवरी से लेकर सितंबर के तीसरे सप्ताह तक के कारोबार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक ज्यादातर समय बिकवाल की भूमिका में ही बने रहे हैं। फरवरी, जुलाई और अगस्त में एफपीआई द्वारा की गई खरीदारी के बावजूद जनवरी से लेकर अभी तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लिवाली और बिकवाली मिलाकर घरेलू शेयर बाजार से 2,43,353 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी कर चुके हैं। इसके पहले साल 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लिवाली और बिकवाली के आंकड़ों को मिला कर भारतीय शेयर बाजार से कुल 1.66 लाख करोड़ रुपये की निकासी की थी।
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि कि वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में की गई बढ़ोतरी की वजह से विदेशी निवेशक दुनिया भर के बाजार से अपना पैसा सुरक्षित निकालने में जुट गए हैं। इसक असर भारतीय बाजार में एफपीआई द्वारा की जा रही बिकवाली के रूप में भी नजर आ रहा है।
खुराना सिक्योरिटीज एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ रवि चंदर खुराना का कहना है कि विदेशी निवेशकों की द्वारा सितंबर के महीने में लगातार की जा रही बिकवाली के लिए तीन कारणों को जिम्मेदार माना जा सकता है। इनमें अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और ऊंची बॉन्ड यील्ड, जियो पॉलिटिकल टेंशन के बीच कच्चे तेल की कीमत में आए उछाल और डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा रुपये में कमजोरी की बात शामिल है।
खुराना के मुताबिक अमेरिका के केंद्रीय बैंक यूएस फेडरल रिजर्व ने सितंबर की मीटिंग में बेंचमार्क ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। इसके बाद ब्याज दरें 3.75 प्रतिशत से चार प्रतिशत हो गई हैं। ऐसा होने से भारत और अमेरिका के बीच यील्ड का अंतर कम हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय एसेट्स का आकर्षण घट गया है।
इसी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरावट आने के बावजूद लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर बनी हुई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल को लगातार ऊंचाई पर बनाए रखा है, जिससे महंगाई और भारत के आयात बिल को लेकर चिंता बढ़ गई है। ऐसी कठिन स्थितियों में रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। पिछले सप्ताह रुपये में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले चार महीने में उसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट रही। इन सभी वजहों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारताय बाजार से अपना पैसा निकालने में जुट गए हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक