मौद्रिक नीति से स्टॉक मार्केट में मायूसी, उम्मीद के बावजूद नहीं मिल सका बूस्टर डोज

 


नई दिल्ली, 07 अक्टूबर (हि.स.)। देश की आर्थिक विकास दर को रफ्तार देने और महंगाई पर लगाम कसने के इरादे से नीतिगत ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी करने का फैसला शेयर बाजार के लिए बहुत चौंकाने वाला नहीं था, क्योंकि शेयर बाजार को पहले से ही इस बढ़ोतरी की उम्मीद थी। हालांकि, शेयर बाजार में इस बात को लेकर मायूसी जरूर है कि मौद्रिक नीति ने स्टॉक मार्केट को वो बूस्टर डोज नहीं दिया, जिसकी लंबे समय से उम्मीद की जा रही थी।

मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना ही कि इस बार बड़े निवेशकों और ब्रोकरेज हाउसेज का ध्यान नीतिगत दरों में बदलाव से कहीं ज्यादा रिजर्व बैंक के उस रुख पर गया है, जहां एक तरफ देश की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) के अनुमान को काफी मजबूत किया गया है, तो दूसरी तरफ महंगाई के मोर्चे पर चिंताएं अभी भी बरकरार दिखाई दे रही हैं। रिजर्व बैंक ने अपने रुख को तटस्थ से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' यानी नपी-तुली सख्ती की ओर मोड़ दिया है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद फिलहाल बहुत कम है।

धामी सिक्योरिटीज के वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत धामी का कहना है कि घरेलू शेयर बाजारों के लिए रिजर्व बैंक का यह मिला-जुला रुख एक नई पहेली लेकर आया है। एक तरफ जहां जीडीपी विकास दर के अनुमान को वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया गया है, जो कॉर्पोरेट जगत की कमाई और मांग में मजबूती का स्पष्ट संकेत है। दूसरी तरफ, महंगाई के अनुमान को भी 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया गया है। यह विरोधाभास शेयर बाजार के लिए चिंता की वजह बना हुआ है। इससे यह बात भी साफ होती है कि केंद्रीय बैंक देश के आर्थिक विकास की मजबूत रफ्तार को देखते हुए अब पूरा ध्यान महंगाई को काबू में करने पर केंद्रित करेगा। बाजार के नजरिये से देखें, तो यह स्थिति बताती है कि ब्याज दरों में हाल-फिलहाल कोई राहत नहीं मिलने वाली है, जिससे कंपनियों की कर्ज लागत ऊंची बनी रहेगी।

धामी का कहना है कि बाजार की मौजूदा स्थिति पहले से ही काफी नाजुक बनी हुई है। पिछले कुछ महीनों में शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। जहां निफ्टी और सेंसेक्स अपने पिछले उच्च स्तरों से काफी नीचे आ चुके हैं, जिसकी वजह से निवेशक लगातार दबाव महसूस कर रहे हैं। इस गिरावट के बीच रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति ने बाजार को वो बूस्टर डोज या राहत नहीं दी, जिसकी उम्मीद कुछ निवेशक कर रहे थे। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे में कोई कमी नहीं है, क्योंकि अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी की विकास दर 7.8 प्रतिशत रही थी, जो रिजर्व बैंक के पिछले अनुमानों से कहीं बेहतर थी। इस मजबूत आर्थिक गतिविधि का सीधा फायदा देश के उन उद्योगों और कंपनियों को मिलेगा जो घरेलू मांग पर निर्भर हैं, जिससे उनके राजस्व में अच्छी वृद्धि देखने को मिल सकती है।

कॉर्पोरेट जगत के लिए अब सबसे बड़ी परीक्षा चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के नतीजों की होगी। बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि प्रमुख कंपनियों के राजस्व और मुनाफे में वार्षिक आधार पर करीब 20 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा सकती है। इनमें ऑटोमोबाइल, बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और मेटल क्षेत्र का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है, लेकिन इस चमक के पीछे एक बड़ा खतरा भी छिपा हुआ है। वो खतरा है कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और कच्चे माल की ऊंची लागत। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर या इसके आस पास बना हुआ है, जो भारत जैसी बड़ी तेल आयातक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। तेल की इन ऊंची कीमतों के कारण कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन पर 100 से 150 बेसिस प्वाइंट का दबाव देखने को मिल सकता है, क्योंकि ईंधन, माल ढुलाई और पैकेजिंग की लागत लगातार बढ़ रही है।

प्रशांत धामी के अनुसार वैश्विक मोर्चे पर भी भारतीय बाजारों के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार हो रही बढ़ोतरी और वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों के उच्च स्तर पर बने रहने के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपनी पूंजी निकाल रहे हैं। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) और आम लोगों द्वारा म्यूचुअल फंड में की जा रही एसआईपी के भारी निवेश ने बाजार को एक मजबूत सुरक्षा कवच दिया है। इसके बावजूद विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार की जा रही भारी बिकवाली के कारण बाजार में जोरदार तेजी का रास्ता अभी भी खुल नहीं सका है।

जानकारों का कहना है कि मोटे तौर पर देखें, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के समीकरण अब पूरी तरह बदल चुके हैं। देश की 7.1 प्रतिशत की अनुमानित जीडीपी विकास दर जहां कंपनियों के मुनाफे और कमाई को एक मजबूत आधार (फ्लोर) प्रदान कर रही है, वहीं 5.2 प्रतिशत की महंगाई और 5.5 प्रतिशत की ऊंची रेपो रेट ने शेयर बाजार के वैल्यूएशन की ऊपरी रफ्तार पर एक सीलिंग यानी रोक लगा दी है। आने वाले समय में शेयर बाजार की दिशा पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय कंपनियां इस वैश्विक दबाव और ऊंची लागत के बीच अपने तिमाही नतीजों में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर पाती हैं या नहीं।

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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक