वाराणसी : शादी का झांसा देकर संबंध बनाने के आरोपी को एक लाख के निजी मुचलके पर जमानत मंजूर

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वाराणसी। जनपद के चर्चित आपराधिक प्रकरण में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम), वाराणसी ने आरोपी अनुज राजभर की जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए विस्तृत और कारणयुक्त आदेश पारित किया। मामला धारा 69, 351(2), 352 बी.एन.एस. के अंतर्गत दर्ज था, जिसमें विवाह का झांसा देकर संबंध बनाने का आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों, अभियोजन के कथनों और उच्चतम न्यायालय की नज़ीरों का तुलनात्मक परीक्षण करते हुए जमानत मंजूर की।

बचाव पक्ष की संयुक्त दलीलें
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी, वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश त्रिवेदी और वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला ने संयुक्त रूप से तथ्यात्मक और विधिक आधारों पर विस्तृत बहस प्रस्तुत की।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कथित संबंध दीर्घ अवधि तक चले, जिससे प्रथम दृष्टया सहमति (कंसेंट) का प्रश्न उत्पन्न होता है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक ऐसे मामले में “तथ्यात्मक भ्रांति” स्वतः सिद्ध नहीं मानी जा सकती, जब तक अभियोजन यह स्पष्ट और ठोस साक्ष्यों से स्थापित न करे कि सहमति वास्तविक और स्वतंत्र नहीं थी।

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अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि प्राथमिकी, बाद के बयानों और घटनाक्रम के समय-क्रम में संगति की जांच आवश्यक है। साथ ही आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास न होना और उसका न्यायिक अभिरक्षा में होना भी जमानत विचार में महत्वपूर्ण कारक है। बचाव पक्ष ने संवैधानिक स्वतंत्रता और स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि विचाराधीन अवस्था में जमानत सामान्य नियम है, जबकि निरुद्धता अपवाद।

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
अपने आदेश में न्यायालय ने कहा कि अभियोजन को अपराध के प्रत्येक आवश्यक तत्व को सिद्ध करना होगा। रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया जमानत के प्रतिकूल नहीं पाई गई। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास प्रस्तुत नहीं किया गया और वह न्यायिक अभिरक्षा में निरुद्ध था। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने एक लाख रुपये के निजी मुचलके और समरूप जमानतदार की शर्त पर जमानत स्वीकृत की। साथ ही यह शर्त भी लगाई गई कि आरोपी साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेगा, गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा और न्यायालय की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेगा।

विधिक हलकों में चर्चा का विषय
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश जमानत संबंधी मामलों में न्यायालय द्वारा अपनाए गए संतुलित दृष्टिकोण का उदाहरण है। तथ्य और विधि के संयुक्त परीक्षण के आधार पर दिया गया यह निर्णय प्रशासनिक और न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जमानत आदेश के बाद आरोपी के परिजनों ने बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। वर्तमान में यह फैसला विधिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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