संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर हाईकोर्ट का अहम आदेश, बीएचयू कुलपति को तीन माह में निर्णय लेने के निर्देश

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वाराणसी। बीएचयू में पिछले 12 से 13 वर्षों से संविदा पर कार्यरत गैर-शिक्षण कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। न्यायालय ने विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया है कि कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले प्रत्यावेदन पर नियमानुसार विचार करते हुए तीन माह के भीतर निर्णय लिया जाए। हाईकोर्ट के इस आदेश से लंबे समय से नियमित नियुक्ति की मांग कर रहे कर्मचारियों में नई उम्मीद जगी है।

यह आदेश रिट याचिका संख्या 18901/2024 पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की एकल पीठ ने पारित किया। इस याचिका में अनूप कुमार सहित कुल 40 संविदा गैर-शिक्षण कर्मचारी पक्षकार हैं, जो वर्ष 2013-14 से विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में सेवाएं दे रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष बताया कि वे पिछले एक दशक से अधिक समय से बीएचयू में ऑफिस असिस्टेंट, ऑडिट असिस्टेंट और अन्य गैर-शिक्षण पदों पर लगातार कार्य कर रहे हैं। उनका कहना था कि वे विश्वविद्यालय के नियमित प्रशासनिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन लंबे समय से सेवाएं देने के बावजूद उन्हें स्थायी नियुक्ति नहीं दी गई और अब भी संविदा पर ही कार्य कराया जा रहा है। कर्मचारियों ने इसे सेवा संबंधी अधिकारों और समान अवसर के सिद्धांत से जुड़ा मामला बताते हुए नियमितीकरण की मांग की।

सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से समय पर जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर न्यायालय ने नाराजगी भी जताई। मामले की पूर्व सुनवाई में न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने विश्वविद्यालय को जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर देते हुए 2,000 रुपये का हर्जाना लगाया था। साथ ही यह राशि हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद में जमा कराने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब स्वीकार्य नहीं है।

अंतिम सुनवाई में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे एक सप्ताह के भीतर अपना नया प्रत्यावेदन बीएचयू के कुलपति के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके बाद कुलपति को आदेश दिया गया कि वे संबंधित नियमों, उपलब्ध अभिलेखों और सभी तथ्यों पर विचार करते हुए तीन माह के भीतर इस मामले का विधिसम्मत निस्तारण करें।

न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय द्वारा विज्ञापन संख्या 07/2024-2025 के तहत की जाने वाली नई नियुक्तियां कुलपति द्वारा नियमितीकरण के संबंध में लिए जाने वाले अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। यानी इस मामले में होने वाला फैसला भविष्य की भर्ती प्रक्रिया पर भी प्रभाव डाल सकता है।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद वर्षों से नियमितीकरण की मांग कर रहे संविदा कर्मचारियों में उम्मीद की नई किरण जगी है। कर्मचारियों का मानना है कि अब उनके लंबे समय से लंबित मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन को समयबद्ध तरीके से निर्णय लेना होगा। हालांकि, नियमितीकरण को लेकर अंतिम फैसला बीएचयू प्रशासन द्वारा न्यायालय के निर्देशों, विश्वविद्यालय के नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही लिया जाएगा। ऐसे में अब सभी की निगाहें कुलपति के निर्णय पर टिकी हैं, जिससे संविदा कर्मचारियों के भविष्य की दिशा तय होगी।

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