पड़ाव-रामनगर सिक्स लेन, ये घरौंदे नही टूटे हैं, टूटी हैं उम्मीदें, सपने और हसरतें

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रिपोर्टर- डा. राकेश सिंह

वाराणसी। हर शख्श अजनबी था जहां, उस मोड़ से शुरू करें फिर ये जिंदगी। ये हैं तो किसी शायर की लिखी चंद लाइने लेकिन पड़ाव रामनगर चौड़ीकरण की जद में आकर अपना सब कुछ गंवा देने वालों का दर्द भी ये लाइनें बखूबी बयाँ करती हैं। किसी का घरौंदा टूटा तो किसी की जिंदगी टूटी। किसी की आस टूटी तो किसी की उम्मीदें टूटी। और तो और पीढ़ियों की विरासतें भी एक झटके में हमेशा के लिए जमीदोंज हो गई। पड़ाव से लेकर रामनगर के लगभग साढ़े छह किमी के दायरे में कुल 415 लोगों के निर्माणों पर बुल्डोजर या तो चल गए या फिर चलने वाले हैं। इनमें मकान भी है, दुकानें भी है और लोगों के सपनों का संसार भी है। 

 

रामनगर के नगरीय इलाके में जितने भी निर्माण ध्वस्तीकरण की चपेट में आये उन सभी में कई पीढ़ियों की यादें दफन हुई। कोई पचास तो कोई पचहत्तर तो कोई उससे भी ज्यादा वर्षों से इसमें रह रहा था। आजीविका चला रहा था। खुद के साथ साथ बच्चों के सपने न सिर्फ बुन रखे थे बल्कि उन सपनों को आकार देने में जुटा हुआ था। लेकिन विकास के तेज रफ्तार पहिये ने एक झटके में सब कुछ छीन लिया। मुआवजा या क्षतिपूर्ति का मसला अपनी जगह अलग लेकिन दिलों पर चले बुल्डोजर से जो जख्म उभरे है उन्हें भरने में शायद पीढियां गुजर जाएंगी। ये पीढ़ी तो अपने उजड़ने के इस दौर की कहानियां भी अगली पीढ़ी को सुनाने से शायद गुरेज ही करे। सुनाएगी भी तो क्या ये कि हम इन चौबारों पर कभी हंसते थे, जिंदगी जीते थे, सपनों को उड़ान भरते देखते थे। 

 

सुबह की सूरज की अलसाई किरणों की ताजगी महसूस करते थे तो रात का घना अंधेरा भी अपना होता था। इन अंधेरों से पार पाने का जज्बा भी रखते थे। लेकिन विकास की जरूरत और जद्दोजहद शायद भारी पड़ गई। निश्चित है कि चौड़ीकरण के बाद रामनगर का नगरीय इलाका नए रंग रूप में दिखेगा। निश्चित रूप से कई सहूलियतें भी हासिल होगी। रफ्तार तेज होंगी। लेकिन उनका क्या जिनका विस्थापन होना है। कहाँ होगा कैसे होगा यह सवाल सबको मथ रहा है। खास कर उन्हें जिनके पास न अब अपनी जमीं बची है न उनके हिस्से का आसमान। जिनकी आजीविका छिनी है उनके सामने न सिर्फ अपने पेट का सवाल मुंह बाए खड़ा हो गया है बल्कि परिवार चलाने की जद्दोजहद भी बड़ी समस्या बन गई है। जिनके आशियाने टूटे हैं उनको तो और बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। निराशा की चादर हर तरफ फैली हुई है तो उम्मीदों की स्याह लफ्फाजी भी हमसाया है। शनिवार को बिना रिक्टर स्केल वाले आये भूकम्प ने लोगों की ही नही उनकी भी आंखे भिगों दी जिनका विकास की इस बेतहाशा रफ्तार की चपेट से कोई वास्ता नही था। बहरहाल जिंदगी मिली है तो जीना है ही ..... नई राह खोजने, उस पर संभल कर चलने पर भी बार बार गिरने के खतरों से भी निपटने का सलीका ढूंढना ही होगा ....हर हाल में।

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