काशी के माधोपुर में हजारों दीयों से जगमगाया शूलटंकेश्वर घाट, देव दीपावली पर दिखा ग्रामीण पर्यटन और आस्था का संगम
देव दीपावली के पावन अवसर पर इस बार काशी का दक्षिण द्वार माधोपुर गांव का शूलटंकेश्वर घाट अद्भुत रोशनी से जगमगा उठा। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की ग्रामीण पर्यटन योजना के तहत चयनित माधोपुर गांव ने परंपरा, संस्कृति और आस्था का अनोखा संगम पेश किया।
ग्रामवासियों, स्वयं सहायता समूहों, स्थानीय होमस्टे लाभार्थियों, एनजीओ और ‘बकरी छाप’ संस्था के सहयोग से घाट को हजारों मिट्टी के दीयों से सजाया गया। गंगा तट पर स्थित प्राचीन शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर की यह देव दीपावली एक विशेष आकर्षण बन गई।
काशी का ‘दक्षिण द्वार’ शूलटंकेश्वर मंदिर
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि शूलटंकेश्वर मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है। मान्यता है कि जब गंगा काशी में प्रवेश करने लगीं, तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गंगा के वेग को रोक लिया था और उनसे वचन लिया कि वे काशी को स्पर्श करती हुई प्रवाहित होंगी ताकि भक्तों को कोई हानि न हो। इसी कारण इस स्थान को काशी का दक्षिण द्वार कहा जाता है।
यह मंदिर वाराणसी के माधोपुर गांव (रोहनिया क्षेत्र) में गंगा किनारे स्थित है, जो कैंट स्टेशन से लगभग 15 किलोमीटर और अखरी बाईपास से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर है।
ग्रामवासियों की भागीदारी से सजा दीपोत्सव
देव दीपावली की पूर्व संध्या पर शाम 4 बजे शूलटंकेश्वर घाट पर हजारों दीप प्रज्ज्वलित किए गए। इन दीयों को पंचकोशी यात्रा मार्ग के गांवों के स्थानीय कुम्हारों ने तैयार किया था, जिससे ग्रामीण कारीगरों को भी आर्थिक लाभ मिला।
ICSSR और महाविद्यालय का योगदान
इस आयोजन में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम “काशी की मृत्तिका कला: अतीत, वर्तमान एवं भविष्य” के अंतर्गत वसंत महिला महाविद्यालय, राजघाट (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संबद्ध) ने भी सहयोग किया। महाविद्यालय की ओर से 1001 दीपक प्रदान किए गए, जिससे इस पर्व की आभा और बढ़ गई।
‘हेरिटेज स्टोरी टेलिंग’ सत्र बना आकर्षण
दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही एक विशेष ‘हेरिटेज स्टोरी टेलिंग’ सत्र आयोजित किया गया, जिसमें शूलटंकेश्वर मंदिर की पौराणिक कथा, माधोपुर की सांस्कृतिक परंपराएं और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रयासों पर रोचक प्रस्तुतियां दी गईं। इस सत्र के माध्यम से ग्रामीणों को ग्रामीण पर्यटन योजना के लाभों की जानकारी भी दी गई।
अन्य गांवों में भी मनाया गया दीप पर्व
ग्रामीण पर्यटन योजना के तहत चयनित अन्य गांवों — चंद्रावती (जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु की जन्मस्थली), कैथी (मार्कण्डेय महादेव मंदिर), उमराह और रहती (त्रिलोचन महादेव मंदिर) — में भी मिट्टी के दीयों से देव दीपावली मनाई गई।
ग्रामीण पर्यटन से बढ़ेगा रोजगार
मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि देव दीपावली जैसे आयोजनों के माध्यम से ग्रामीण पर्यटन को सशक्त किया जा रहा है। इससे स्थानीय कारीगरों और महिलाओं को रोजगार के अवसर मिलते हैं और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। साथ ही, उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलती है।

