शोधनिबन्धचन्द्रिका’ का लोकार्पण, संस्कृत शोध और भारतीय ज्ञान परंपरा को मिला नया आयाम
वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत शोध और शास्त्रीय चिंतन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज हुई। विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त वेदान्तशास्त्र के प्रख्यात विद्वान प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी द्वारा रचित त्रिखण्डीय ग्रंथ ‘शोधनिबन्धचन्द्रिका’ का भव्य लोकार्पण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कुलसचिव राकेश कुमार (आईएएस) की उपस्थिति में किया। इस अवसर को विश्वविद्यालय की समृद्ध विद्वत परंपरा और भारतीय ज्ञान-संपदा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया गया।
इस अवसर पर कुलपति ने कहा कि ‘शोधनिबन्धचन्द्रिका’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि संस्कृत शोध-जगत के लिए एक सशक्त मार्गदर्शक ग्रंथ है। उन्होंने कहा कि प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने अपने लंबे शैक्षणिक अनुभव, गहन अध्ययन और मौलिक अनुसंधान के आधार पर इस कृति में शोध-पद्धति, शास्त्रीय विश्लेषण, तात्त्विक विमर्श और अकादमिक लेखन के विभिन्न पक्षों का व्यवस्थित एवं प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण किया है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण का काल है। ऐसे समय में यह ग्रंथ शोधार्थियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। साथ ही यह संस्कृत एवं भारतीय दर्शन के क्षेत्र में नई शोध-दृष्टि विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कुलपति ने विश्वास व्यक्त किया कि यह कृति आने वाली पीढ़ियों के शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी।
कुलसचिव राकेश कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्यों द्वारा किया जा रहा साहित्यिक और शैक्षणिक योगदान संस्थान की बौद्धिक समृद्धि का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह पुस्तक के रूप में समाज और नई पीढ़ी तक पहुंचे। प्रो. त्रिपाठी की यह कृति इसी उद्देश्य को सफलतापूर्वक पूरा करती है।
ग्रंथकार प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने बताया कि ‘शोधनिबन्धचन्द्रिका’ के तीनों खंडों में संस्कृत साहित्य, भारतीय दर्शन और वेदान्त से जुड़े विभिन्न विषयों पर उनके वर्षों के शोध, चिंतन और प्रकाशित शोध-पत्रों का संकलन किया गया है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह ग्रंथ शोधार्थियों और विद्वानों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री सिद्ध होगा।
समारोह में उपस्थित विद्वानों और शिक्षकों ने इस कृति को संस्कृत जगत के लिए मूल्यवान उपलब्धि बताते हुए कहा कि इसमें संकलित शोध-निबंध शास्त्रीय गंभीरता, तार्किक विश्लेषण, प्रामाणिक संदर्भों और मौलिक चिंतन का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करते हैं। कार्यक्रम के अंत में सभी विद्वानों, शिक्षकों और शोधार्थियों ने प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी को इस महत्वपूर्ण प्रकाशन के लिए बधाई देते हुए इसे विश्वविद्यालय की गौरवशाली शैक्षणिक परंपरा को समृद्ध करने वाली ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।

