काशी में 1100 बटुकों ने एक साथ धारण किया यज्ञोपवीत, वैदिक मंत्रों से गूंजा धर्मसंघ, करपात्री जी महाराज ने शुरू की थी परंपरा
वाराणसी। दुर्गाकुण्ड स्थित श्री धर्मसंघ मणि मंदिर में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर एक भव्य और आध्यात्मिक आयोजन देखने को मिला, जहां 1100 बटुकों ने एक साथ वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यज्ञोपवीत धारण किया। यह आयोजन धर्मसंघ पीठाधीश्वर Swami Shankardev Chaitanya Brahmachari के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
वैदिक रीति से संपन्न हुई पूरी प्रक्रिया
सुबह सात बजे से ही धर्मसंघ परिसर में अनुष्ठानों की शुरुआत हो गई थी। सबसे पहले मुख्य यजमान और बटुकों द्वारा संकल्प लिया गया, इसके बाद पंचांग पूजन, स्नान और छौरकर्म की प्रक्रिया पूरी कराई गई। तत्पश्चात पीले वस्त्र धारण कर बटुकों ने विधि-विधान के साथ यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण किया। पूरा परिसर वैदिक मंत्रों और धार्मिक वातावरण से गूंज उठा।
101 वेदियों पर आचार्यों ने कराया संस्कार
कार्यक्रम के दौरान सभागार में 101 वेदियां बनाई गई थीं, जहां मुख्य आचार्य पंडित शिवपूजन पाण्डेय और सह आचार्य पंडित रामानन्द पाण्डेय के नेतृत्व में 111 सहआचार्यों ने बटुकों से यज्ञोपवीत की पूरी प्रक्रिया संपन्न कराई। संस्कार के दौरान बटुकों ने परिजनों से भिक्षा मांगकर परंपरा का निर्वहन भी किया, वहीं महिलाओं ने मंगल गीत गाकर वातावरण को और भी भावपूर्ण बना दिया।
शिक्षा से पहले यज्ञोपवीत का महत्व बताया
धर्मसंघ के महामंत्री पंडित जगजीतन पाण्डेय ने बताया कि ब्राह्मणों के लिए यज्ञोपवीत संस्कार अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसके बाद ही वेद अध्ययन का अधिकार प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि यह संस्कार व्यक्ति को आध्यात्मिक और शैक्षिक रूप से पूर्णता प्रदान करता है।
गणमान्य लोगों ने दिया आशीर्वाद
इस अवसर पर शहर दक्षिणी के विधायक Neelkanth Tiwari सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे और बटुकों को आशीर्वाद दिया। मुख्य यजमान रामप्रकाश दुबे ने सभी अनुष्ठानों का सफल संचालन कराया।
शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण का भी हुआ शुभारंभ
अक्षय तृतीया के मौके पर धर्मसंघ शिक्षा मंडल के वैदिक बटुकों के लिए निःशुल्क शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण की भी शुरुआत की गई। यह पहल धर्मसम्राट Swami Karpatri Ji Maharaj की प्रेरणा से शुरू की गई है। विख्यात सितार वादक Devabrata Mishra के निर्देशन में प्रशिक्षकों ने बटुकों को गायन, तबला और संवादिनी का प्रशिक्षण दिया। पहले दिन राग यमन, भजन और बनारस घराने के तालों का अभ्यास कराया गया।
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यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि काशी की सांस्कृतिक और वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम भी बना।

