IIT BHU के ‘स्वर’ सिद्धांत की विश्व स्तर पर सराहना, इटली में अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजा भारतीय शोध
वाराणसी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर अभिषेक कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में विकसित प्लाज़्मा भौतिकी की नई वैज्ञानिक अवधारणा "Symbiosis of Waves and Reconnection (SWAR)" को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। इटली के फ्लोरेंस में आयोजित प्रतिष्ठित COSPAR-2026 सम्मेलन में 2 और 3 अगस्त को इस विषय पर दो दिवसीय विशेष वैज्ञानिक सत्र आयोजित किया गया, जिसकी सह-अध्यक्षता प्रो. अभिषेक श्रीवास्तव और दक्षिण कोरिया के Korea Astronomy and Space Science Institute (KASI) के प्रोफेसर आर.-वाई. क्वॉन ने की।
इस विशेष सत्र में भारत के अलावा दक्षिण कोरिया, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, चीन, रूस, बेल्जियम, क्रोएशिया, नॉर्वे सहित कई देशों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, अंतरिक्ष शोधकर्ताओं और युवा वैज्ञानिकों ने भाग लिया। सम्मेलन में प्लाज़्मा भौतिकी के उस नए सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की जा रही है, जिसे प्रो. अभिषेक श्रीवास्तव ने विकसित किया है।

"Symbiosis of Waves and Reconnection (SWAR)" का उद्देश्य यह समझना है कि प्लाज़्मा में ऊर्जा किस प्रकार उत्पन्न होती है, उसका स्थानांतरण कैसे होता है और तापमान बढ़ने की प्रक्रिया किन वैज्ञानिक कारकों से प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अवधारणा अंतरिक्ष विज्ञान के साथ-साथ नियंत्रित फ्यूज़न ऊर्जा, प्लाज़्मा आधारित प्रयोगों और भविष्य की ऊर्जा तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रो. श्रीवास्तव और उनकी शोध टीम इस विषय पर पहले ही कई महत्वपूर्ण शोध प्रकाशित कर चुकी है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में स्थान मिला है। अब COSPAR-2026 में इस विषय पर आयोजित विशेष सत्र विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोगात्मक अनुसंधान को नई गति देने का माध्यम बन रहा है।
इस शोध अवधारणा का संक्षिप्त नाम "SWAR (स्वर)" रखा गया है। यह नाम भारतीय शास्त्रीय संगीत के 'स्वर' से प्रेरित है और विज्ञान तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के समन्वय का प्रतीक माना जा रहा है। भारतीय वैज्ञानिक सोच और सांस्कृतिक पहचान के इस अनूठे मेल ने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। इस उपलब्धि से न केवल IIT (BHU) बल्कि भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई प्रतिष्ठा और पहचान मिली है।

