IIT-BHU ने जटिल लौह अयस्कों से स्वच्छ धातु उत्पादन की पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की, मिला पेटेंट

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रिपोर्ट: ओमकार नाथ

वाराणसी। आईआईटी (बीएचयू), वाराणसी के वैज्ञानिकों ने जटिल और निम्न-ग्रेड लौह अयस्कों से स्वच्छ धातु निकालने की एक नई, पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है, जिसे पेटेंट भी प्राप्त हो चुका है। यह तकनीक पारंपरिक लौह एवं इस्पात निर्माण प्रक्रियाओं की तुलना में कहीं कम प्रदूषणकारी है और कार्बन उत्सर्जन को उल्लेखनीय रूप से घटाने की क्षमता रखती है। यह शोध धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग में प्रो. गिरिजा शंकर महोबिया के नेतृत्व में, डॉ. बिस्वजीत मिश्रा और डॉ. लक्कोजू शंकर राव के सहयोग से किया गया।

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पीएचडी शोध से व्यावहारिक तकनीक तक का सफर
प्रो. महोबिया ने बताया कि यह कार्य एक पीएचडी शोध के रूप में शुरू हुआ था, जो आगे चलकर एक व्यवहारिक और उद्योग-उपयोगी तकनीक में बदल गया। उनका कहना है कि इस शोध का मुख्य उद्देश्य स्वच्छ धातु का उत्पादन, मूल्यवान धातु तत्वों की हानि को रोकना और पर्यावरणीय क्षति को न्यूनतम करना रहा है।

पारंपरिक इस्पात उत्पादन की पर्यावरणीय चुनौती
उन्होंने बताया कि इस्पात का उपयोग भवनों, पुलों, रेलवे, वाहनों, मशीनरी और घरेलू उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है, लेकिन पारंपरिक इस्पात निर्माण प्रक्रियाएं अत्यधिक ऊर्जा-खपत वाली हैं। वैश्विक स्तर पर इस्पात उद्योग से कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 7–8 प्रतिशत हिस्सा आता है। कोयला आधारित प्रक्रियाओं में प्रति टन इस्पात उत्पादन पर करीब 2 टन CO₂ उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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घटते उच्च-ग्रेड अयस्क और अशुद्धियों की समस्या
भारत में उच्च-ग्रेड लौह अयस्कों की उपलब्धता लगातार घट रही है। वर्तमान में उपलब्ध अयस्कों में लौह की मात्रा कम और अशुद्धियां अधिक पाई जाती हैं। इनमें निकेल और क्रोमियम जैसे उपयोगी धातु तत्व भी मौजूद रहते हैं, लेकिन पारंपरिक तकनीकों से इन्हें प्रभावी ढंग से अलग करना कठिन होता है, जिससे संसाधनों की बर्बादी होती है।

हाइड्रोजन आधारित स्वच्छ प्रक्रिया
इस नई तकनीक की खास बात यह है कि इसमें कोयला या कोक का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता। इसके स्थान पर हाइड्रोजन गैस का प्रयोग किया जाता है। हाइड्रोजन लौह अयस्क से ऑक्सीजन को हटाकर धातु का निष्कर्षण करती है, बिना किसी अतिरिक्त अशुद्धि के। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग शून्य के करीब पहुंच जाता है।

कैसे होती है प्रक्रिया
प्रक्रिया के तहत पहले लौह अयस्क के सूक्ष्म कणों को पेलेट्स यानी छोटे गोलाकार कणों के रूप में तैयार किया जाता है। इन पेलेट्स को नियंत्रित वातावरण में हाइड्रोजन गैस के संपर्क में लाया जाता है, जिससे अयस्क का अपचयन होता है और स्वच्छ लौह प्राप्त होता है। आगे गर्म करने पर धातु और स्लैग स्वतः अलग हो जाते हैं और छोटे-छोटे शुद्ध धातु के नगेट्स बनते हैं।

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उत्पादित धातु की गुणवत्ता
इस तकनीक से प्राप्त धातु में लौह की मात्रा 97 से 97.5 प्रतिशत तक होती है। इसमें 0.7 से 0.8 प्रतिशत निकेल और लगभग 1 प्रतिशत क्रोमियम भी मौजूद रहता है, जो इस्पात को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाता है। कार्बन, सल्फर और सिलिकॉन जैसी अशुद्धियां नगण्य मात्रा में होती हैं, जिससे आगे रिफाइनिंग की जरूरत काफी कम हो जाती है। साथ ही यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि लौह, निकेल और क्रोमियम जैसे मूल्यवान तत्व स्लैग में न जाकर उपयोगी रूप में प्राप्त हों।

निदेशक ने की सराहना
शोध टीम को बधाई देते हुए प्रो. अमित पात्रा, निदेशक, IIT (BHU) ने कहा कि यह शोध इस बात का प्रमाण है कि संस्थान देश के लिए पर्यावरण-अनुकूल और व्यावहारिक तकनीकों के विकास में लगातार योगदान दे रहा है। उन्होंने इसे कम प्रदूषण, कम ऊर्जा खपत और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

यह नई हाइड्रोजन-आधारित तकनीक भविष्य में लौह एवं इस्पात उद्योग को अधिक हरित और टिकाऊ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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