अंतिम विदाई से पिंडदान तक निभाया रिश्ता, 52 लावारिस दिवंगतों का हुआ तीर्थ श्राद्ध
पंचगंगा घाट पर पितृपक्ष में अमन कबीर सेवा न्यास ने कराया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान
जिनका अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई नहीं था, उनके लिए न्यास बना परिवार
महाश्मशान मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर दी थी अंतिम विदाई
वाराणसी। पितृपक्ष के अवसर पर बुधवार को पंचगंगा घाट पर 52 ज्ञात-अज्ञात दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए तीर्थ श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कराया गया। ये वे लोग थे, जिनका वर्षभर के दौरान अंतिम संस्कार तो हुआ, लेकिन अंतिम समय में अपना कहने वाला कोई साथ नहीं था। अमन कबीर सेवा न्यास ने इन दिवंगतों के लिए परिवार की भूमिका निभाते हुए अंतिम संस्कार से लेकर पिंडदान तक की जिम्मेदारी निभाई।
पंचगंगा घाट पर विधि-विधान से हुआ कर्मकांड
अमन कबीर सेवा न्यास के नेतृत्व में पंचगंगा घाट पर 52 दिवंगतों के लिए हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार श्राद्ध और पिंडदान कराया गया। पंडित वेद आशीष महाराज ने विधि-विधान से धार्मिक कर्मकांड संपन्न कराया। न्यास की ओर से वर्षभर में जिन ज्ञात-अज्ञात, लावारिस, अनाथ और दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों का अंतिम संस्कार कराया गया था, उनके लिए पितृपक्ष में यह धार्मिक अनुष्ठान किया गया।
अंतिम संस्कार से पहले परिजनों की होती है तलाश
अमन कबीर लंबे समय से ऐसे लोगों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं, जिनका दुनिया में कोई सहारा नहीं होता। सड़क दुर्घटना में मौत हो या अस्पताल में किसी लावारिस मरीज की मृत्यु, सूचना मिलने पर न्यास की टीम मौके पर पहुंचती है। पहले मृतक की पहचान और परिजनों की तलाश की जाती है। पहचान नहीं होने अथवा परिवार की ओर से शव छोड़ दिए जाने की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद अंतिम संस्कार कराया जाता है।

मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर दी अंतिम विदाई
कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ऐसे शवों का काशी के मणिकर्णिका या हरिश्चंद्र घाट पर हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कराया जाता है। न्यास की सेवा केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं रहती। पितृपक्ष में इन दिवंगतों के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान भी कराया जाता है।
‘अंतिम समय में कोई नहीं था तो काशी में कोई तो अपना हो’
अमन कबीर ने कहा कि जिन लोगों के अंतिम समय में कोई अपना साथ खड़ा नहीं हुआ, उनके लिए काशी में कोई तो अपना होना चाहिए। प्रयास है कि मृत्यु के बाद भी किसी व्यक्ति को लावारिस न कहलाना पड़े। इसी भावना के साथ न्यास अंतिम संस्कार के बाद पितृपक्ष में दिवंगतों के लिए तर्पण और पिंडदान कराता है।
धार्मिक मान्यता में पिंडदान और तर्पण का महत्व
अमन कबीर के अनुसार धार्मिक मान्यता में दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए पिंड कर्म और तर्पण को महत्वपूर्ण माना गया है। पितृपक्ष को इन संस्कारों के लिए विशेष अवसर माना जाता है। इसी मान्यता के तहत न्यास उन लोगों के लिए भी धार्मिक कर्मकांड कराता है, जिनके निधन के बाद उनके परिजन उपलब्ध नहीं रहे।
कई वर्षों से जारी है सेवा
वाराणसी के दारानगर निवासी अमन कबीर कई वर्षों से इस सेवा कार्य से जुड़े हैं। लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के साथ ही वह उन लोगों के लिए भी आगे आते हैं, जिन्हें किसी कारण उनके परिवारजन अकेला छोड़ देते हैं। बुधवार को पंचगंगा घाट पर हुआ 52 दिवंगतों का श्राद्ध-पिंडदान इसी मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल बना।

