नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर बीएचयू में वृहद परिचर्चा, नीति-निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी पर हुआ मंथन
वाराणसी। Banaras Hindu University के महिला महाविद्यालय स्थित सावित्री बाई फुले सभागार में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ विषय पर एक विस्तृत परिचर्चा एवं विचार-विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों, शिक्षाविदों एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लेते हुए राष्ट्र निर्माण और नीति-निर्धारण में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी पर गहन मंथन किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. Ajit Kumar Chaturvedi ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि निर्णय प्रक्रियाओं में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि लैंगिक समानता को लेकर समाज में व्यापक सहमति तो है, लेकिन इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए ठोस और संरचित उपायों की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी परिवर्तन को स्थायी बनाने के लिए उसे सुनियोजित और क्रमिक ढंग से आगे बढ़ाना आवश्यक है।
कुलपति ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कानून पारित होने के बावजूद इसके क्रियान्वयन की समयसीमा वर्ष 2029 निर्धारित की गई है, क्योंकि इसके लिए जनगणना और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत जैसे विशाल देश में ये प्रक्रियाएं जटिल और समय लेने वाली होती हैं, क्योंकि ये प्रतिनिधित्व के संतुलन से सीधे जुड़ी होती हैं।

उन्होंने विश्वविद्यालयों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले विचार अक्सर शैक्षणिक संस्थानों से ही निकलते हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे व्यक्तियों के बजाय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करें और समाधान-उन्मुख चर्चा को बढ़ावा दें, ताकि समाज को ठोस दिशा मिल सके।
इस अवसर पर कुलसचिव प्रो. Arun Kumar Singh ने अधिनियम के दूरगामी प्रभावों पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस प्रकार वर्ष 2005 में लागू Right to Information Act 2005 ने सुशासन की दिशा में नई राह खोली, उसी प्रकार यह अधिनियम भी महिलाओं के सशक्तिकरण का मजबूत आधार बनेगा और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित करेगा।
Central Institute of Higher Tibetan Studies की कुलसचिव डॉ. सुनीता चंद्रा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि महिला महाविद्यालय का वातावरण सदैव प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने कहा कि अब समय केवल सशक्तिकरण की बात करने का नहीं, बल्कि नीति-निर्धारण में महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करने का है। उन्होंने पंचायत स्तर पर महिलाओं द्वारा किए जा रहे उत्कृष्ट कार्यों की सराहना की।
बीएचयू के विधि संकाय की आचार्य प्रो. Vibha Tripathi ने अधिनियम के कानूनी पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि प्रारंभिक दौर में वह इस विधेयक के पक्ष में नहीं थीं, लेकिन अब इसके महत्व को समझते हुए इसका समर्थन करती हैं। उन्होंने ‘सेपरेट बट इक्वल’, ‘डुअल कांस्टीट्यूएंसी’ और ‘कैपिंग’ जैसे महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों पर भी अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में स्वाति सिंह (निदेशक, मुहिम संस्था) ने ‘लीड बाय वूमेन’ की अवधारणा को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। वहीं, प्रो. भास्कर भट्टाचार्य (अध्यक्ष, IQAC बीएचयू) ने कहा कि जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा और महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक विकास अधूरा रहेगा। उर्दू विभाग के डॉ. अफजल हुसैन ने विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

महिला महाविद्यालय की ग्रीष्मा टोप्पो ने कहा कि यह अधिनियम महिलाओं के अधिकारों, भागीदारी और सामाजिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे समाज में नए विश्वास का संचार होगा।
कार्यक्रम के समापन चरण में महिला महाविद्यालय की प्रो. पद्मिनी रवीन्द्रनाथ ने सभी वक्ताओं के विचारों का सार प्रस्तुत किया और प्रश्नोत्तर सत्र का संचालन किया, जिसमें छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का संयोजन छात्रा ध्रुवी एवं अनुष्का ने किया, जबकि डॉ. रुक्मणि जायसवाल ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों एवं छात्राओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर महिला महाविद्यालय की छात्राओं, शोधार्थियों एवं संकाय सदस्यों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही, जिससे कार्यक्रम अत्यंत सफल और सार्थक रहा।

