वाराणसी में आदिवासी कांग्रेस का प्रदर्शन, ‘बनवासी’ शब्द पर जताया विरोध
वाराणसी। आदिवासी पहचान और अधिकारों को लेकर शुक्रवार को वाराणसी में आदिवासी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन करते हुए “आदिवासी विरोधी विचारधारा” का प्रतीकात्मक पुतला दहन किया। यह कार्यक्रम आल इंडिया आदिवासी कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया और उत्तर प्रदेश आदिवासी कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. उमेश चन्द्र के आह्वान पर आयोजित किया गया।
प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज को ‘बनवासी’ कहकर उनकी ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाते हुए कहा, “हम बनवासी नहीं, आदिवासी हैं और भारत के मूलनिवासी हैं।” उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान, अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेगा।
आदिवासी कांग्रेस नेताओं ने भाजपा और आरएसएस पर आरोप लगाते हुए कहा कि आदिवासियों को ‘बनवासी’ कहकर उनकी पहचान को केवल जंगलों तक सीमित करने की कोशिश की जा रही है। नेताओं ने संविधान सभा के सदस्य रहे जयपाल सिंह मुंडा का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भी ‘बनवासी’ शब्द का विरोध किया था और ‘आदिवासी’ शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया था, क्योंकि यही शब्द उनके इतिहास, संस्कृति और जमीन पर पारंपरिक अधिकारों को दर्शाता है।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार और विभिन्न संगठन मंचों पर आदिवासी संस्कृति और नृत्य का प्रदर्शन करते हैं, वहीं दूसरी ओर देश के कई जंगल क्षेत्रों को कारपोरेट कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। उन्होंने हसदेव अरण्य, केन-बेतवा लिंक परियोजना, सिंगरौली, सिजिमाली, अरावली और अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
आदिवासी कांग्रेस नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान, इतिहास और संस्कृति से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि वे बिरसा मुंडा और जयपाल सिंह मुंडा के विचारों को आगे बढ़ाते हुए जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।

