विश्व कछुआ दिवस : धरती के प्राचीन प्रहरी और पर्यावरण संतुलन के संरक्षक हैं कछुएं, कछुओं के संरक्षण में जुटा वन विभाग, नमामि गंगे ने किया जागरूक
वाराणसी। हर वर्ष 23 मई को मनाया जाने वाला विश्व कछुआ दिवस केवल एक जीव के संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के प्रति मानव समाज की जिम्मेदारी को याद दिलाने वाला महत्वपूर्ण अवसर है। कछुए पृथ्वी के सबसे प्राचीन जीवों में गिने जाते हैं और करोड़ों वर्षों से धरती पर जीवन चक्र का हिस्सा बने हुए हैं। अपनी धीमी गति, शांत स्वभाव और अद्भुत सहनशीलता के कारण कछुए धैर्य, संतुलन और स्थिरता के प्रतीक माने जाते हैं। कछुओं के संरक्षण के लिए वन विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। वहीं नमामि गंगे की ओर से भी गंगा घाटों पर अभियान चलाकर इसको लेकर जागरूक किया गया।
भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपराओं में भी कछुओं का विशेष स्थान है। संस्कृत में कछुए को “कूर्म” कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय कूर्मावतार धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला था। यह कथा केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि धैर्य और संतुलन से ही सृष्टि का संचालन संभव है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में कछुए को शुभ, स्थायित्व और संयम का प्रतीक माना जाता है।
पर्यावरणीय दृष्टि से कछुए प्रकृति के लिए अत्यंत उपयोगी जीव हैं। नदियों, तालाबों और समुद्रों में रहने वाले कछुए जल के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे जल में अनियंत्रित रूप से बढ़ने वाले शैवाल और जैविक अवशेषों को नियंत्रित करते हैं, जिससे पानी स्वच्छ बना रहता है। कई प्रजातियां बीजों और सूक्ष्म जीवों के प्रसार में भी सहायक होती हैं, जिससे जैव विविधता सुरक्षित रहती है। समुद्री कछुए समुद्री जीवन चक्र के आधार स्तंभ माने जाते हैं और उनकी उपस्थिति अनेक समुद्री जीवों के अस्तित्व से जुड़ी होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कछुए अप्रत्यक्ष रूप से भूमि की उर्वरता और प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला को संतुलित बनाए रखने में भी योगदान देते हैं। हालांकि बढ़ते प्रदूषण, प्लास्टिक कचरे, अवैध शिकार और प्राकृतिक आवासों के लगातार नष्ट होने के कारण आज कछुओं की कई प्रजातियां विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। नदियों और समुद्रों में फेंका जाने वाला प्लास्टिक उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।
वाराणसी में गंगा नदी के संरक्षण के साथ कछुओं की सुरक्षा के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। गंगा में स्थापित कछुआ वन्यजीव अभयारण्य कछुओं की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण और नदी की स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि गंगा को स्वच्छ बनाए रखने में कछुओं का योगदान बेहद अहम है, क्योंकि वे जल में मौजूद जैविक अवशेषों को नियंत्रित करते हैं।
भारत सरकार ने भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कछुओं को अनुसूची-1 में शामिल कर उन्हें उच्चतम कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। इसके बावजूद इनके संरक्षण के लिए जनजागरूकता की आवश्यकता बनी हुई है। पर्यावरण प्रेमियों ने लोगों से सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग बंद करने और कछुओं के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखने की अपील की है। विश्व कछुआ दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि प्रकृति के इन मौन प्रहरियों को बचाया गया, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण का संतुलन सुरक्षित रह सकेगा।

