पत्नी की मौत, जेब में बस सिंदूर और साड़ी के पैसे…अपनों ने भी छोड़ा साथ, तब बेबस बुजुर्ग के लिए इंसानियत की उम्मीद बनकर पहुंचे अमन कबीर

WhatsApp Channel Join Now

वाराणसी। यह कहानी किसी खबर से ज़्यादा मानवता की पुकार है। एक ऐसी सच्चाई, जो समाज को आईना दिखाती है और यह बताती है कि जब अपने ही साथ छोड़ दें, तब भी इंसानियत ज़िंदा रहती है।
मैदागिन स्थित पराड़कर भवन के नीचे वह दृश्य हर किसी की आंखें नम कर देने वाला था।

दस साल की सेवा, एक पल में सब सूना
छागुर विश्वकर्मा… एक गरीब बुजुर्ग, जिसने अपनी पत्नी प्रभावती की लगभग दस वर्षों तक बीमारी में दिन-रात सेवा की। पत्नी ही उसका संसार थी, वही सहारा, वही वजह। लेकिन अचानक बीमारी ने उसे छीन लिया। प्रभावती का निधन हो गया और छागुर विश्वकर्मा इस दुनिया में बिल्कुल अकेले रह गए।

ं

रिश्तों ने मोड़ा मुंह, जेब में थे सिर्फ सिंदूर और साड़ी
पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए उनके पास न पैसे थे, न साधन। वह मदद की आस में रिश्तेदारों के दरवाज़े पर गए, भाइयों के पास हाथ जोड़े… लेकिन कोई साथ देने को तैयार नहीं हुआ। जेब में पैसे के नाम पर सिर्फ पत्नी के लिए रखा सिंदूर और एक साड़ी थी। वही लेकर वह मदद की तलाश में भटकते रहे। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के दिल को झकझोर देने वाला था।

ं

जब इंसानियत बनकर पहुंचे अमन कबीर
इसी बेबसी के बीच वाराणसी के जाने-माने समाजसेवी अमन कबीर तक यह बात पहुंची। बिना किसी देरी के अमन कबीर मौके पर पहुंचे। उन्होंने न सवाल किया, न पहचान पूछी—सिर्फ इंसान समझकर मदद का हाथ बढ़ाया।

अमन कबीर सेवा न्यास के माध्यम से प्रभावती का अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान और सम्मान के साथ कराया गया। उस बुजुर्ग के लिए यह सिर्फ मदद नहीं थी, बल्कि टूटते जीवन में फिर से भरोसे की लौ थी।

ं

कोरोना से आज तक, इंसानियत की मिसाल
अमन कबीर कोई नया नाम नहीं हैं। कोरोना काल में जब लोग अपनों से डर रहे थे, तब उन्होंने बिना अपनी जान की परवाह किए सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों जरूरतमंदों की मदद की। दाह संस्कार, घायलों का इलाज, बिछड़े हुए लोगों को अपनों से मिलवाना, गरीबों का उपचार—दिन हो या रात, अमन कबीर 24 घंटे सेवा में तत्पर रहते हैं।

एक रुपये का दान, करोड़ों की दुआ
वाराणसी की जनता उन्हें जानती है, मानती है। लोग एक रुपये का दान देकर भी उनके साथ खड़े होते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि यह पैसा किसी मजबूर की आख़िरी ज़रूरत बनेगा। प्रशासनिक अधिकारी हों या राजनीतिक दल—हर वर्ग अमन कबीर के कार्यों की सराहना करता है। खास बात यह है कि वह बिना किसी राजनीतिक उद्देश्य के, निस्वार्थ भाव से यह सेवा कर रहे हैं।

ं

यह सिर्फ एक समाचार नहीं, समाज के लिए सवाल है
छागुर विश्वकर्मा की यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि रिश्ते क्या सिर्फ नाम के रह गए हैं? और साथ ही यह भी बताती है कि जब समाज में अमन कबीर जैसे लोग मौजूद हों, तब इंसानियत कभी नहीं मरती। यह खबर एक बुजुर्ग की लाचारी की नहीं, बल्कि मानवता की जीत की कहानी है।

Share this story