कौन थे अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह, जिनके नाम पर प्रयागराज के मशहूर स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय का नाम रखने की उठ रही मांग?

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प्रयागराज के स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय का नाम बदलकर 'अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय' करने की मांग एक बार फिर चर्चा में है। काकोरी ट्रेन एक्शन की शताब्दी वर्ष के अवसर पर यह मांग तेज हुई है और इसके समर्थन में अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू हो चुका है। सवाल यह है कि आखिर ठाकुर रोशन सिंह कौन थे और उनके नाम पर अस्पताल का नामकरण करने की मांग क्यों की जा रही है? क्या इसके पीछे केवल भावनात्मक आग्रह है या कोई ठोस ऐतिहासिक आधार भी मौजूद है?

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दरअसल, ठाकुर रोशन सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान क्रांतिकारियों में शामिल थे, जिनका योगदान अक्सर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां जैसे बड़े नामों की चर्चा के बीच अपेक्षाकृत कम सामने आ पाता है। हालांकि इतिहासकार मानते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की विचारधारा को मजबूत करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

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किसान परिवार से क्रांतिकारी बनने तक का सफर
ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को तत्कालीन शाहजहांपुर जिले (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के नबादा गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस था। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) से जुड़ गए। यह वही क्रांतिकारी संगठन था, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना और आगे चलकर काकोरी ट्रेन एक्शन जैसी ऐतिहासिक घटना को अंजाम दिया।

काकोरी कांड में मिली फांसी
9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन के निकट सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर क्रांतिकारियों ने धन लूटा। इस घटना का उद्देश्य निजी लाभ नहीं, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना था।

दिलचस्प तथ्य यह है कि ठाकुर रोशन सिंह इस कार्रवाई में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं थे। इसके बावजूद अंग्रेज सरकार ने उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख सदस्यों में मानते हुए मुकदमे में शामिल किया। मुकदमे के दौरान उन्हें कठोर दंड दिया गया और अंततः फांसी की सजा सुनाई गई। इतिहासकारों का मानना है कि यह फैसला अंग्रेजी शासन द्वारा क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने की रणनीति का हिस्सा था।

मलाका जेल में दी गई फांसी
19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की तत्कालीन मलाका जेल में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई। इसी दिन गोरखपुर जेल में रामप्रसाद बिस्मिल और फैजाबाद जेल में अशफाक उल्ला खां को भी फांसी दी गई थी, जबकि राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को गोंडा जेल में फांसी दी गई थी। इन चारों क्रांतिकारियों का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।

फांसी के समय ठाकुर रोशन सिंह के साहस और धैर्य की चर्चा आज भी इतिहास में दर्ज है। कहा जाता है कि उन्होंने निर्भीकता के साथ फांसी का सामना किया और मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

आज जहां अस्पताल है, वहीं थी मलाका जेल
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार यही है। जिस स्थान पर आज प्रयागराज का प्रसिद्ध स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय स्थित है, वहीं कभी ब्रिटिश शासन की कुख्यात मलाका जेल हुआ करती थी। इसी जेल में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी।

यही कारण है कि उनके समर्थकों और इतिहास से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इस परिसर का किसी स्वतंत्रता सेनानी से सबसे गहरा ऐतिहासिक संबंध है, तो वह ठाकुर रोशन सिंह हैं। इसलिए अस्पताल का नाम उनके नाम पर रखा जाना इतिहास के साथ न्याय होगा।

समर्थकों का तर्क क्या है?
अस्पताल का नाम बदलने की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि आजादी के 79 वर्ष बाद भी ठाकुर रोशन सिंह को वह राष्ट्रीय पहचान नहीं मिल सकी, जिसके वे अधिकारी थे। उनका तर्क है कि काकोरी शताब्दी वर्ष इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का सबसे उपयुक्त अवसर है।

वे यह भी कहते हैं कि नामकरण केवल एक औपचारिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि इससे आने वाली पीढ़ियां उस क्रांतिकारी के बारे में जान सकेंगी जिसने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। इसके साथ ही मलाका जेल की ऐतिहासिक स्मृति भी संरक्षित रहेगी।

इतिहास और स्मृति के बीच खड़ा यह सवाल
स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय का नाम बदलने की मांग केवल एक प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं है, बल्कि यह इतिहास, स्मृति और राष्ट्रीय विरासत से जुड़ा प्रश्न भी बन गया है। एक ओर अस्पताल का वर्तमान नाम देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेहरू परिवार की स्मृति का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं दूसरी ओर मांग करने वालों का कहना है कि जिस भूमि पर अस्पताल बना है, उसका सीधा और ऐतिहासिक संबंध अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान से है।

इसी ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर आंदोलनकारी मानते हैं कि यदि किसी नाम का इस स्थल से सबसे अधिक औचित्यपूर्ण संबंध है, तो वह अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह का है। उनके अनुसार ऐसा निर्णय केवल एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के एक अपेक्षाकृत कम चर्चित लेकिन महान क्रांतिकारी को उचित सम्मान देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा।

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