हौसलों की उड़ान : वाराणसी की गुंजन ने फतह किया साउथ अमेरिका का सबसे ऊंचा शिखर, फहराया तिरंगा, बाबा विश्वनाथ को समर्पित की उपलब्धि
वाराणसी। काशी की बेटी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अगर हौसले मजबूत हों तो उम्र और सीमाएं मायने नहीं रखतीं। वाराणसी की पर्वतारोही गुंजन अग्रवाल ने 49 वर्ष की उम्र में दक्षिण अमेरिका की सबसे ऊंची चोटी माउंट अकोंकागुआ (6,961 मीटर) को फतह कर इतिहास रच दिया। यह शिखर अर्जेंटीना स्थित एंडीज पर्वतमाला में स्थित है और एशिया के बाहर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है। अपनी इस ऐतिहासिक उपलब्धि को गुंजन ने बाबा विश्वनाथ को समर्पित किया।

अपनी सफलता को याद करते हुए गुंजन बताती हैं कि अकोंकागुआ पर चढ़ाई आसान नहीं थी। तेज हवाएं इस पर्वत की सबसे बड़ी चुनौती हैं। उन्होंने बताया कि 16 किलो वजन का विशेष सूट पहनने के बावजूद 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली तेज हवा ने उन्हें उड़ा दिया था। आंखों के सामने अंधेरा छा गया, वह नीचे गिर पड़ीं और पैरों में चोट भी लगी, लेकिन हिम्मत नहीं हारीं। कुछ देर आराम के बाद उन्होंने फिर से चढ़ाई शुरू की और आखिरकार शिखर तक पहुंचने में सफल रहीं।

गुंजन अग्रवाल पेशे से बेकरी और फ्लॉवर शॉप चलाती हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना संक्रमण के बाद अपनी इम्यूनिटी और फिटनेस को मजबूत करने के उद्देश्य से उन्होंने ट्रेनिंग शुरू की। इसी दौरान उनके फिटनेस कोच हीरा सिंह से मुलाकात हुई, जिन्होंने उन्हें पर्वतारोहण के लिए प्रेरित किया और हर स्तर पर मार्गदर्शन दिया।

पर्वतारोहण की शुरुआत से पहले गुंजन ने किताबों और शोध के माध्यम से पूरी तैयारी की। इसके बाद उन्होंने कश्मीर के सोनमर्ग और लद्दाख के कांग्यांसेन-2 पर 6,250 मीटर तक की चढ़ाई कर अनुभव हासिल किया। इसके बाद उन्होंने रूस-यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एल्ब्रुस को फतह किया। 30 अगस्त 2024 की रात 12 बजे शुरू हुई चढ़ाई के बाद सुबह 6:30 बजे उन्होंने एल्ब्रुस की चोटी पर पहुंचकर तिरंगा लहराया।

अकोंकागुआ अभियान की शुरुआत 11 जनवरी 2026 को हुई। कई चरणों में आगे बढ़ते हुए टीम कैंप नंबर तीन तक पहुंची, जिसके बाद सीधे शिखर पर चढ़ाई करनी थी। बिना किसी अतिरिक्त कैंप के, लगातार आठ घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद 21 जनवरी की सुबह गुंजन ने 6,961 मीटर ऊंचे शिखर पर भारत का झंडा फहराया। वह इस ट्रेकिंग टूर में शामिल पुरुषों के बीच अकेली महिला थीं। कठिन परिस्थितियों, सीमित सुविधाओं और बाथरूम जैसी बुनियादी दिक्कतों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

गुंजन बताती हैं कि माउंट अकोंकागुआ एक मृत ज्वालामुखी पर्वत है, जो अपनी खड़ी चढ़ाई और खतरनाक हवाओं के लिए जाना जाता है। चढ़ाई के दौरान गिरने और चोट लगने की घटना के बावजूद उनके ट्रैकर ने उनका हौसला बढ़ाया और टीम ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। इस उपलब्धि के साथ ही गुंजन अब माउंट एवरेस्ट पर ट्रेकिंग के लिए पात्र हो गई हैं, क्योंकि 7,000 मीटर के करीब ऊंचाई फतह करने के बाद एवरेस्ट अभियान की योग्यता मिल जाती है। हालांकि उन्होंने फिलहाल एवरेस्ट पर चढ़ने का इरादा टाल दिया है। उनका कहना है कि एवरेस्ट अभियान बेहद खर्चीला है और फिलहाल वह परिवार, अपने व्यवसाय और मैराथन इवेंट्स पर ध्यान देना चाहती हैं।

आगे की योजनाओं को लेकर गुंजन ने बताया कि कुछ दिन आराम के बाद वह मैराथन की तैयारी शुरू करेंगी। उम्र और ऊंचाई के साथ सांस लेने में आने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए वह अब फिटनेस और दौड़ पर फोकस करेंगी। कोच हीरा सिंह के मार्गदर्शन में वह मैराथन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेंगी।






