वाराणसी की संस्कृति संसद में गोरक्षा के लिए कानून बनाने की मांग, शंकराचार्य बोले- सनातन धर्म पर हो रहे चौतरफा हमले
- रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में तीन दिवसीय संस्कृति संसद का शुभारंभ, देशभर से करीब 1500 संतों की भागीदारी
- अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्रपुरी महाराज बोले- सनातन धर्म के विरुद्ध हर षड्यंत्र का मुकाबला करेगा संत समाज
वाराणसी। काशी के सिगरा स्थित रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में मंगलवार को तीन दिवसीय संस्कृति संसद-2026 का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में देशभर से पहुंचे संतों, धर्माचार्यों और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, गोरक्षा और सामाजिक चुनौतियों पर अपने विचार रखे। ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज ने गोमाता की रक्षा के लिए प्रभावी कानून बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय, गंगा और गीता का विशेष महत्व है। वहीं, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि संत समाज भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए एकजुट है और सनातन धर्म के विरुद्ध किसी भी षड्यंत्र का मुकाबला करेगा।

'गोमाता भारतीय संस्कृति का आधार, संरक्षण के लिए बने कानून'
संस्कृति संसद के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति के सामने अनेक चुनौतियां हैं। इनसे निपटने के लिए संत समाज को संगठित होकर काम करना होगा।
उन्होंने कहा कि संस्कृति संसद में संतों और धर्माचार्यों द्वारा रखे जा रहे विचारों पर अमल करने की आवश्यकता है। उन्होंने कुछ मौजूदा कानूनों में बदलाव की मांग भी उठाई।
गोरक्षा का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में गाय, गंगा और गीता का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गाय भारतीय संस्कृति का आधार है, इसलिए उसकी रक्षा के लिए कानून बनाए जाने चाहिए।
उन्होंने 1962 में करपात्री महाराज के नेतृत्व में हुए गोरक्षा आंदोलन का उल्लेख करते हुए तत्कालीन सरकार की कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने सरकार और समाज से गोरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की अपील की।

'सनातन धर्म के विरुद्ध षड्यंत्रों से मुकाबले को तैयार संत समाज'
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति की रक्षा में संत समाज की ऐतिहासिक भूमिका रही है।
उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और अखिल भारतीय संत समिति का प्रयास है कि देश के विभिन्न पंथों के संत एक मंच पर आएं और सांस्कृतिक विषयों पर सामूहिक रूप से विचार करें।
रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि संस्कृति संसद में देश के विभिन्न हिस्सों से संतों की भागीदारी इस एकजुटता का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि संत समाज सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
'जंतर-मंतर के रास्ते सत्ता परिवर्तन की कोशिश' : स्वामी जितेंद्रानंद
अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने अपने संबोधन में दिल्ली में होने वाले विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक गतिविधियों पर सवाल उठाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ व्यक्ति और संगठन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय आंदोलनों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन का प्रयास कर रहे हैं।
स्वामी जितेंद्रानंद ने कहा कि संत समाज को ऐसी गतिविधियों के प्रति सजग रहना चाहिए। उन्होंने युवाओं से सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में योगदान देने की अपील की।
विहिप पदाधिकारियों ने कानूनों और धर्मांतरण का मुद्दा उठाया
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक दिनेश ने अपने संबोधन में कई सामाजिक और कानूनी विषयों पर विचार रखे।
उन्होंने यूजीसी से जुड़े कानूनों, लिव-इन रिलेशनशिप और पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार से जुड़े प्रावधानों पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इन विषयों पर चर्चा कर कुछ कानूनों में बदलाव की मांग उठाई जाएगी।
वहीं, विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक ने जनसंख्या में बदलाव और धर्मांतरण को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने दावा किया कि जनसंख्या संबंधी बदलावों से सामाजिक असंतुलन की स्थिति पैदा हो रही है।
उन्होंने संत समाज से धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर जनजागरण अभियान चलाने का आह्वान किया। ये वक्ताओं के विचार और दावे हैं, जिनके समर्थन में प्रेस विज्ञप्ति में स्वतंत्र आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।
'गुरुकुलों के साथ संस्कार केंद्रों की भी जरूरत'
कथावाचक आचार्य सुधांशु महाराज ने भारतीय शिक्षा परंपरा और गुरुकुल व्यवस्था को मजबूत बनाने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए गुरुकुलों के साथ संस्कार केंद्रों की स्थापना भी आवश्यक है।
उन्होंने युवाओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि युवाओं के विरोध और असंतोष को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। समाज और व्यवस्था को युवाओं की चिंताओं को समझकर समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।

संस्कृति संसद में उठा जेन जी का मुद्दा, युवाओं की भूमिका पर मंथन
तीन दिवसीय संस्कृति संसद के अंतर्गत 'जेन जी कॉन्क्लेव' का भी आयोजन किया गया। इसमें युवाओं की सामाजिक भूमिका, सोशल मीडिया के प्रभाव और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर चर्चा हुई।
कॉन्क्लेव में कुछ वक्ताओं ने 'जेन जी' की अवधारणा को अमेरिकी दृष्टिकोण पर आधारित बताते हुए इसे भारतीय युवाओं के संदर्भ में अनुपयुक्त बताया।
डॉ. दीपक प्रधान ने कहा कि सोशल मीडिया के कारण युवाओं के व्यवहार और सामाजिक नेटवर्क में बदलाव आया है। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर युवाओं के आंदोलनों का उल्लेख किया।
बनारस घराने के कथक कलाकार विशाल कृष्ण ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला।
दिल्ली सेंट्रल यूनिवर्सिटी की इशू मौर्य ने कहा कि युवाओं को सोशल मीडिया पर किसी भी घटना के संबंध में प्रतिक्रिया देने से पहले सूचनाओं की विश्वसनीयता जांचनी चाहिए।
वक्ता भागेश ने कहा कि सरकार और समाज को युवाओं की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि उनमें असंतोष कम हो।
भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष किसलय तिवारी ने भारतीय परंपरा के युवा आदर्शों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से प्रेरणा लेनी चाहिए।
देशभर से पहुंचे करीब 1500 संत और धर्माचार्य
आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधर ने संस्कृति संसद की पृष्ठभूमि और उद्देश्यों की जानकारी दी। उन्होंने भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए संत समाज और युवाओं की सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया।
आयोजकों के अनुसार, संस्कृति संसद में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से करीब 1500 संत, महामंडलेश्वर और आचार्य शामिल हुए।
उद्घाटन सत्र में जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य महाराज, विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय, महामंडलेश्वर मनमोहन दास, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रामचंद्र पांडेय और महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी सहित अनेक संत और विद्वान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। मंचासीन संतों का स्वागत सुनील देवधर, प्रो. अरविंद जोशी और प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने किया। संचालन संत समिति के कोषाध्यक्ष जनार्दन हरि ने किया। इस दौरान 'संस्कृति पर्व' पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया।
मधुबनी पेंटिंग और विदेशी कलाकारों की तस्वीरों ने खींचा ध्यान
संस्कृति संसद के अवसर पर रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में कला और छायाचित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई।
प्रदर्शनी में पद्मश्री दुलारी देवी की मधुबनी पेंटिंग और पद्मश्री श्याम शर्मा की भगवान हनुमान पर आधारित पेंटिंग आकर्षण का केंद्र रहीं।
इसके अलावा काशी के घाटों, भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और महाकुंभ से संबंधित कलाकृतियां भी प्रदर्शित की गईं।
प्रदर्शनी में थाईलैंड, अमेरिका और तुर्की के कलाकारों के छायाचित्र भी शामिल किए गए। आयोजन स्थल पर रंगोली के माध्यम से भारतीय संस्कृति और परंपराओं को दर्शाया गया।
तीन दिवसीय संस्कृति संसद में धर्म, संस्कृति, शिक्षा और युवाओं से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।

