वाराणसी : मानसून की फुहारों से आबाद हुए खेत, धान की रोपाई ने पकड़ी रफ्तार
वाराणसी। मानसून की सक्रियता और रुक-रुक कर हो रही बारिश ने काशी सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में खेती-किसानी की रफ्तार बढ़ा दी है। आषाढ़ माह के साथ ही धान की रोपाई का कार्य जोर पकड़ चुका है। खेतों में पर्याप्त पानी भरने के बाद किसान पूरे उत्साह के साथ रोपाई में जुटे हैं। गांवों में सुबह से शाम तक महिलाएं और पुरुष कीचड़ से भरे खेतों में मेहनत करते दिखाई दे रहे हैं। हरियाली से आच्छादित खेत और किसानों की सक्रियता ग्रामीण अंचल में नए कृषि सत्र की शुरुआत का संकेत दे रही है।
पूर्वांचल में धान प्रमुख खरीफ फसल है और इसकी खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। समय पर और संतुलित वर्षा होने से फसल की अच्छी शुरुआत मानी जाती है, जबकि बारिश में कमी या अत्यधिक वर्षा उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि किसान हर साल मानसून का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

धान की रोपाई एक लंबी और श्रमसाध्य प्रक्रिया है। सबसे पहले किसान खेतों को तैयार कर धान की नर्सरी लगाते हैं। लगभग तीन से चार सप्ताह बाद जब पौधे तैयार हो जाते हैं, तब उन्हें सावधानीपूर्वक उखाड़कर पानी से भरे खेतों में कतारबद्ध तरीके से लगाया जाता है। इस कार्य में परिवार के सदस्य, खेतिहर मजदूर और विशेष रूप से महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। महिलाएं घंटों पानी और कीचड़ में खड़े होकर पौधों की रोपाई करती हैं, जबकि पुरुष खेत की जुताई, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों को संभालते हैं।
किसान भाईलाल विश्वकर्मा ने बताया कि इस वर्ष समय पर बारिश होने से रोपाई का कार्य तेजी से चल रहा है। उनके अनुसार धान की खेती पूरी तरह मौसम पर निर्भर रहती है। यदि पूरे सीजन में इसी तरह संतुलित वर्षा होती रही तो इस बार बेहतर उत्पादन मिलने की पूरी उम्मीद है।
कृषि वैज्ञानिकों का भी मानना है कि धान की अधिक उपज के लिए समय पर रोपाई बेहद आवश्यक है। उनका कहना है कि रोपाई के दौरान खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखने, संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने, जल निकासी की उचित व्यवस्था रखने तथा कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी करने से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। किसानों को मौसम के अनुसार कृषि विभाग की सलाह का पालन करने की भी सलाह दी गई है।
धान की खेती पूर्वांचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। अच्छी पैदावार से न केवल किसानों की आय बढ़ती है, बल्कि स्थानीय बाजारों और कृषि आधारित गतिविधियों को भी गति मिलती है। फिलहाल काशी के गांवों में खेतों में गूंजते लोकगीत, किसानों की मेहनत और धान की रोपाई का उत्साह इस बात का संकेत है कि नए कृषि मौसम की शुरुआत उम्मीदों के साथ हो चुकी है। अब किसानों की नजरें मानसून की निरंतर मेहरबानी पर टिकी हैं, ताकि उनकी मेहनत आने वाले महीनों में भरपूर फसल का रूप ले सके।

